नारी चेतना
बेटियाँ पराया धन नहीं
“पराया धन” केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि वह सामाजिक सोच है जो बेटियों को अपने ही घर में अस्थायी महसूस कराती है। यह लेख स्त्री की स्वतंत्र चेतना, आत्मसम्मान और भावनात्मक सबलता की आवश्यकता पर गंभीर प्रश्न उठाता है और समाज से आग्रह करता है कि बेटियों को संपत्ति नहीं, स्वतंत्र व्यक्तित्व की तरह देखना सीखे।
“नारी केवल देह नहीं”
नारी केवल देह नहीं” नारी के अस्तित्व, आत्मसम्मान और सांस्कृतिक गौरव पर आधारित एक विचारोत्तेजक हिंदी कविता है। यह रचना नारी को केवल बाहरी रूप से नहीं, बल्कि त्याग, ममता, शक्ति और संस्कृति की वाहक के रूप में देखने का संदेश देती है।
मैं कहीं भी नहीं थी…
यह कविता एक ऐसी स्त्री की आवाज़ है जो हर जगह मौजूद होते हुए भी कहीं दर्ज नहीं थी। यह उसकी पहचान, उसकी अनसुनी चीख और उसके जीवित रहने के अधिकार की मार्मिक अभिव्यक्ति है।
श्मशान से लौटती साँसें…
श्मशान की राख से लौटकर जब ज़िंदगी की जिम्मेदारियाँ बाँहों में भर ली जाती हैं—तब यह कविता मृत्यु से आँख मिलाकर जीवन को चुनने का साहस बन जाती है।
दो मुंह वाली प्याज़
शुक्रवार की शाम सब्ज़ी मंडी में पहुँची अंजली को आज सिर्फ़ प्याज़ नहीं, ज़िंदगी का गहरा सच दिखा। दुकानदार ने कहा — “मैडम, ये दो मुँह वाली प्याज़ है, इसलिए सस्ती है।”
उस पल अंजली को एहसास हुआ कि इस दुनिया में दो मुँह वाले सिर्फ़ प्याज़ नहीं, इंसान भी हैं — फर्क बस इतना है कि प्याज़ के दो मुँह की गारंटी तो सब्ज़ीवाला देता है, पर आदमियों के दो मुँह और गिरगिट जैसे रंगों की कोई गारंटी नहीं। व्यंग्य और यथार्थ के इस संगम में कहानी आधुनिक स्त्री के भीतर छिपे आक्रोश, व्यथा और आत्मबोध को उजागर करती है।
“देह, निर्णय और दरारें”
पितृसत्ता केवल सामाजिक ढांचा नहीं, बल्कि एक गहराई से जड़ें जमाई मानसिक संरचना है जो पुरुष को सत्ता और स्त्री को ‘अन्य’ मानकर उसके श्रम, निर्णय और देह पर नियंत्रण स्थापित करती है। यह लेख पितृसत्ता की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, मनोवैज्ञानिक और आधुनिक सामाजिक परतों को खोलते हुए यह सवाल उठाता है कि आखिर हम ‘मनुष्य’ से ‘स्त्री’ और ‘पुरुष’ में कब और कैसे बंट गए?
