
दिव्या सिंह, प्रसिद्ध लेखिका और वाइस आर्टिस्ट
आज काम से जल्दी घर आ गई थी। घर के थोड़े-मोड़े काम निबटा कर सोचा, चलूँ थोड़ा आराम कर लूँ। कब सो गई, पता ही नहीं चला। अचानक शोर सुनकर आँख खुल गई… ये क्या, रात हो गई इतनी जल्दी? और ये शोर कैसा है? आधी जागी, आधी सोई मैं ये सोचने लगी। कोशिश की ध्यान लगाकर सुनने की, तो एक झपकी और आ गई… अब शोर तेज़ हो चुका था। किस्म-किस्म की आवाज़ें साफ़-साफ़ सुनाई दे रही थीं। हड़बड़ा कर उठ गई… अँधेरे में ही पलंग से अपनी चुन्नी ढूँढी और अंदाज़े से लाइट जलाने के लिए उठी। मन ही मन सोच रही थी — यार क्यों लेटी, पता नहीं कितनी रात हो गई मुझे सोते-सोते… शुक्रवार है, भूल ही गई थी। तभी पलंग के पाए से पैर टकराया… और फिर सारी नींद काफूर हो गई। बरबस ही मुँह से निकल गया — “उईईईई अम्मा!”
हाथ का सहारा दीवार पर लेना चाहा तो सीधा स्विच पर हाथ लगा — कमरे में उजाला फैल गया। तुरंत घड़ी पर नज़र गई, दिल को तसल्ली हुई — रात के साढ़े आठ ही बजे हैं। फटाफट फ्रेश होकर कमरे से बाहर आई। पर्स उठाया, रसोई की खूंटी से थैला उतारा… और ताला मारकर सीढ़ियाँ उतरने लगी।
मन ही मन सोच रही थी — कैसे भूल गई आज शुक्रवार है! चलो, सही वक्त पर आँख खुल गई। विचारों के गलियारे में भटक ही रही थी कि तभी पीछे से आवाज़ आई —
“अरे अंजली… आज तो नौ बजे ही आ गई ऑफिस से?”
ये कॉलोनी की फालतू आंटियाँ भी न! इनको चैन नहीं — देर से क्यों आई, जल्दी क्यों… मन ही मन बुदबुदाई।
तभी दूसरा सवाल दाग दिया — “अरे अकेले अंधेरे में कहाँ जा रही है?”
“अरे आंटी, आज तो सात बजे ही गई थी। अभी सब्ज़ी लेने जा रही हूँ।”
इतने पर भी उन्हें चैन न था — “अरे अंधेरे में, वो भी अकेले…”
मैंने सोचा, अब बोलेंगी — ‘अरे बेटा, जवान बेटी-बहू खुली तिजोरी की तरह होती है’!
मैंने कहा — “आंटी, अकेले तो एक न एक दिन सभी को जाना होता है। बेहतर है, दुनिया में रहकर ही अकेले चलने की आदत डाल लें… और मुझे अंधेरे से डर नहीं लगता।”
इतने में उनके घर की डोरबेल बजी और वो ये बोलते हुए गईं — “चल, जा, देखती हूँ शायद तेरे अंकल आ गए।”
चलो, पिंड छूटा… ये सोच मैं तेज़ क़दमों से आगे बढ़ने लगी।
शुक्रवार को पास में ही सब्ज़ी मंडी लगती थी, जिसमें सब्ज़ियाँ सस्ती और ताज़ा मिलती थीं। अब शोर और बढ़ गया था। मैं मंडी के करीब पहुँच गई थी। किस्म-किस्म की आवाज़ें आ रही थीं — सब अपने-अपने तरीके से गला फाड़-फाड़ कर हरी-भरी सब्ज़ियाँ बेचने की जुगत में थे। वक्त जैसे-जैसे बढ़ रहा था, सब्ज़ियों के दाम घट रहे थे। तभी अचानक सुनाई दिया —
“प्याज़ बीस की ढाई किलो! प्याज़ बीस की दो किलो!”
आवाज़ सुन मैं ज़मीन पर बैठे सब्ज़ीवाले के पास रुक गई।
“भैया, प्याज़ कैसे दिया है?”
ज़मीन पर लगी दुकान पर प्याज़ के तीन ढेर थे। उसने इशारे से बताया — “मैडम, ये चालीस रुपए किलो, दो किलो लो तो पचास की लगा दूँ… और ये तीस रुपए किलो…”
तीसरे ढेर की तरफ़ इशारा करते हुए बोला — “और ये बीस की ढाई किलो।”
एक साँस में बोलकर वो दूसरे ग्राहक की प्याज़ तौलने लगा।
बीस रुपए की ढाई किलो प्याज़!! गट्ठे तो बड़े-बड़े हैं, दिख भी ताज़ा रही है। और जो छोटी-छोटी है, सड़ी सी दिख रही है, वो तीस की क्यों भला?
जब हर तरीके से खुद विचार मंथन कर चुकी और किसी नतीजे पर नहीं पहुँची तो आखिर दुकानदार से सवाल कर ही बैठी —
“क्यों भैया, तुम चिल्ला तो कुछ और रहे थे और बता कुछ और रहे हो। ये सड़ी सी प्याज़ इतनी महँगी और तुम कम करने को राज़ी नहीं हो? वो बड़ी प्याज़ बीस की ढाई किलो क्यों है? अंदर से खराब माल बेच रहे हो क्या?” — मैं अपना स्वर ऊँचा करते हुए बोली।
झल्ला गया सब्ज़ीवाला और बोला — “प्याज़ उठाकर काटकर दिखा दूँ, मैडम? अंदर बिल्कुल ठीक है प्याज़… सड़ी निकले तो पैसे वापस! अब बोलो, लेना है या नहीं?”
मैं फिर सोच में डूब गई। दुकान पर भीड़ इकट्ठा हो गई। दुकानदार ने तराजू प्याज़ के ढेर में गड़ा दिया और बोला —
“तौलूँ या नहीं? जल्दी बोलो, मैडम!”
फिर तराजू हटाकर झल्लाहट पर काबू करते हुए बोला —
“अरे मैडम, इतनी देर से दुकान पर हो… और भी ग्राहक हैं। बताओ, प्याज़ तौलूँ या नहीं?”
मैंने पूछा — “लेकिन भैया, क्या फ़र्क है जो तुम इसे इतना सस्ता बेच रहे हो?”
उसने प्याज़ का गट्ठा पेट्रोमैक्स की रोशनी में करीब लाकर दिखाते हुए कहा —
“मैडम, ये दो मुँह वाली प्याज़ है, इसलिए सस्ती है।”
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई… आश्चर्यचकित सी देखती रह गई सब्ज़ीवाले को।
वो फिर चिल्लाया — “अरे मैडम, लेनी है या नहीं? जल्दी बताओ, कितनी तोलूँ?”
मेरे मुँह से बरबस ही निकल गया —
“कमाल है! प्याज़ के दो मुँह हैं तो इतना सस्ता, लेकिन आदमियों के दो मुँह और गिरगिट से रंग हैं, फिर भी मंडपों में इतना महँगा बिकता है!”
दुकानदार इस दो मुँह वाले प्याज़ की गारंटी भी ले रहा है कि अंदर से सड़ा नहीं निकलेगा।
लेकिन दो मुँह और गिरगिट से रंग वाले आदमियों की तो मंडप में बेचते वक्त उनके दुकानदार (माँ-बाप) भी गारंटी नहीं देते कि सड़ा निकलेगा या सही!
रुलाता प्याज़ भी है और मर्द भी… मगर प्याज़ तो काटने पर रुलाता है, मर्द तो बिना काटे मारे ही रुलाता है।
उसकी जितनी सेवा करो, नाज़-नखरे उठाओ — वो कहाँ मानेगा? उसे लगता है इसमें भी औरत का कुछ निजी स्वार्थ है।
वो और टेढ़ा चलेगा, और ज्यादा सताएगा, रुलाएगा।
मैं प्याज़ की दुकान से आगे बढ़ने लगी, किसी सुनसान कोने की तलाश में।
दुकानदार पीछे से चिल्लाता रहा —
“मैडम, लो-लो प्याज़, सस्ती लगा देंगे!”
जब मैंने नहीं सुना तो वो बड़बड़ाया — “जाने कहाँ से चले आते हैं ग्राहक, सौदा भी नहीं लेते, वक्त भी खोटा करते हैं!”
मैंने मुड़कर देखा नहीं, पर सुन रही थी…
दिमाग कहीं और था।
चलते-चलते एक पेड़ किनारे लगे बिजली के खंभे का सहारा ले खड़ी हो गई।
ऊपर मुँह उठाकर देखा — आसमान नीचे की लाइटों की वजह से काली चादर-सा लग रहा था। तारे भी नहीं दिख रहे थे।
ऊपर बैठी ‘सुपर नेचुरल पावर’ से मन ही मन कहा —
“भगवन! तेरी भी न लीला अपार है… खुले आम मंडपों में ऐसे लोग बिक रहे हैं, बिना किसी आईएसआई मार्क के। तेरी ही बनाई बेटियाँ उनका शिकार हो रही हैं, और ना तू गारंटी लेता है जिसने उन्हें बनाया, ना उनके दुकानदार जो उनकी परवरिश का जरिया बने।”
अरे, तुझसे तो भला ये किसान सब्ज़ीवाला है —
कम से कम गारंटी तो दे रहा है कि प्याज़ के दो मुँह भले हों, पर अंदर से एकदम ताज़ा है।
इन मर्दों का तो वो भी पता नहीं।
फ़ोन बजा — घंटी की आवाज़ से ख़यालों की दुनिया से बाहर आई।
फ़ोन उठाया —
गुर्राती सी आवाज़ आई —
“कहाँ हो यार, साढ़े दस हो रहे हैं! तीन फ़ोन कर चुका हूँ, एक तो ना साला तुमको फ़ोन उठाने की, ना मालूम क्या बीमारी है। पचास बार कहा कि इन मंडियों से सब्ज़ी लेना मेरे स्टैंडर्ड को सूट नहीं करता, लेकिन तुमको पता नहीं क्या चुल है… मॉल में भी सब्ज़ियाँ बिकती हैं!”
मैं ख़ामोश थी।
“अरे सुन भी रही हो? ज़िंदा हो या मर गई?”
मैंने लंबी ख़ामोशी तोड़ते हुए कहा —
“ज़िंदा हूँ… मरी नहीं। और मैं क्यों मरूँ? मैं मारकर मरूँगी, समझे?”
“एक तो पैसे बचाओ, ऊपर से तुम्हारी सुनो भी… रखो फ़ोन, सब्ज़ी लेकर आती हूँ।”
साले तीन मुँह के मर्द… अरे, इन्हें पालने से तो अच्छा कुत्ता पाल लो — कम से कम वफ़ादारी की तो गारंटी है… ये तो हँहहह…”

Excellent
Absolutely apt in today’s senario.
Wah bahut achchi kahani likh di… Ek ek lafz sach
Thanks
Wah
आदमी दो मुंह वाले और महिलाएं 50 मुंह वाली
ग़लत है,अगर अपवाद छोड़ दे तो औरतें सदियों से सहती ही आईं है
Good
This site is good…Magar Divya Singh alag alag hota hai..
कर दिया अलग-अलग दिव्या और सिंह, आपके सुझावों और प्रतिक्रियाओं का स्वागत है
सच में हर औरत की कहानी पर अंत तो बहुत ही अच्छा था, मज़ा आ गया पढ़ कर
Good