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अरमान

डॉ.नेत्रा रावणकर, प्रसिद्ध लेखिका, उज्जैन

शांता, इस नदी में पानी कब देखने को मिलेगा?’
‘पता नहीं।’
‘हाँ, मुझे बड़ा अरमान है पानी देखने का।’

नदी के ऊपर अपने छोटे से खेत में काम करते-करते पति-पत्नी अकसर इस बात को छेड़ ही देते थे। बहुत मेहनती थे दोनों।
पर अब सप्ताहभर की लगातार बारिश की झड़ी ने अपना रौद्र रूप दिखाया। नदी-नाले सब उफान पर थे। उनकी नदी भी कहाँ पीछे रहने वाली थी? ऐसी बाढ़ आई कि सारी फसल बह गई। खेत में पानी भर गया।

किनारे पर खड़े होकर मटमैले पानी को देखकर वह बोला —
‘बहुत अरमान थे तुझे देखने के, देख ले पानी… जी भर के।’

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