दो मुंह वाली प्याज़
शुक्रवार की शाम सब्ज़ी मंडी में पहुँची अंजली को आज सिर्फ़ प्याज़ नहीं, ज़िंदगी का गहरा सच दिखा। दुकानदार ने कहा — “मैडम, ये दो मुँह वाली प्याज़ है, इसलिए सस्ती है।”
उस पल अंजली को एहसास हुआ कि इस दुनिया में दो मुँह वाले सिर्फ़ प्याज़ नहीं, इंसान भी हैं — फर्क बस इतना है कि प्याज़ के दो मुँह की गारंटी तो सब्ज़ीवाला देता है, पर आदमियों के दो मुँह और गिरगिट जैसे रंगों की कोई गारंटी नहीं। व्यंग्य और यथार्थ के इस संगम में कहानी आधुनिक स्त्री के भीतर छिपे आक्रोश, व्यथा और आत्मबोध को उजागर करती है।
