
आशी प्रतिभा, प्रसिद्ध लेखिका, ग्वालियर (मध्यप्रदेश)
इस मस्ताने फगुआ संग
याद प्रियतम की आई है।
देखो, होली आई है संग,
हमें याद तुम्हारी आई है।
जब-जब रंग लगाया तुमने,
प्रेम की बात हृदय में आई है।
कब से न देखा तुमको हमने,
मिलने की घड़ी अब आई है।
आकर अब मोहे अंग लगा लो,
फागुन में मधुरिम-सी पुरवाई है।
नीला-पीला, ये लाल-गुलाबी रंग,
हाँ, फागुन में याद तुम्हारी आई है।
गीत, ग़ज़ल, ये संगीत तुम्हारे,
हुक हृदय में ये उठ आई है।
अब न रह पाएँगे तुम बिन हम,
तुमको ही रंगने ये होली आई है।
कितने सखा आए हमें रंग लगाने,
हमें न संग किसी के होली भायी है।
आन मिलो अब तुम ही, प्रियतम,
देखो फागुन लौट न जाए याद तुम्हारी आई है।
