
ॠतिका रश्मि, प्रसिद्ध लेखिका
उसने चाहा प्रेम…
और खड़ी कर दी गई
अपराधियों की क़तार में।
फिर घुटती रही, कराहती रही,
मरती रही पल-पल,
नितांत एकाकी,
ज़िन्दगी के तमाम उसूलों के संग।
उसने चाहा देवों का सानिध्य…
और बना दी गई देवदासी।
फिर सहती रही, पिसती रही,
और भिगोती रही
अपने आँचल का कोर
रात-रात भर दबी हुई, गूंगी,
लाचार सिसकियों के संग।
उसने चाहा रूप-लावण्य,
रस और सौंदर्य…
और बना दी गई नगरवधू
या फिर
किसी चकले की महारानी।
यूँ साथ ही साथ शुरू हुआ फिर
उसके मशहूर और अभिशप्त
होने का सिलसिला।
निष्कासित कर दी गई
अपनी ही स्त्री-बिरादरी से
फिर जल्द ही वह,
क्योंकि छीन लिया था
संभ्रांत महिलाओं ने, उनके साथ
हाथ मिला पाने का
उसका अदना-सा एक हक़ भी।
अंत में उसने चुननी चाही उदासीनता
और भरसक विमुख हो जाना चाहा
चाहने के इस फ़रेब से।
यक़ीनन उसने दफ़नानी चाहीं
अपनी अलामतें
कमज़र्फ़ों की इस दुनिया से।
फिर क़रार दी गई विक्षिप्त,
और लुटती रही, पिटती रही,
रात की आगोश में
अपने आप से लिपटती रही, सुबकती रही,
डूबती और उतराती भी रही।
और फिर एक दिन
उसकी सारी चाहतें जाती रहीं।
कुछ भी न चाहने की चाह में, न जाने
वह क्या-कुछ बन गई होगी अब तक?
नदी, पर्वत, चट्टान
या फिर
कोई बरगद-पीपल का पेड़?
मेरा ख़याल कहता है कि
वह किसी बियाबान में,
चटख लाल टेशू के फूलों से लदे
किसी वृक्ष की डाल पर बैठी होगी
और जंगल में आग लगा रही होगी शायद।
