लाल टेशू के फूलों से लदे पेड़ की डाल पर बैठी एक अकेली स्त्री की परछाईं, पृष्ठभूमि में धुंधला बियाबान जंगल

उसने चाहा प्रेम…

यह कविता स्त्री की उन अधूरी इच्छाओं की कहानी कहती है जिन्हें समाज ने अपराध, पाप या विद्रोह घोषित कर दिया। प्रेम, सौंदर्य, आध्यात्म और स्वतंत्रता की चाह रखने वाली स्त्री हर मोड़ पर दंडित होती रही लेकिन अंततः वह अपनी ही आग में एक नई सत्ता बनकर उभरती है।

Read More

जो दिखता है, वह पूरा नहीं स्त्री जीवन के अनकहे अध्याय

शीशमहल” हो या “अंतिम प्रश्न”, कविता वर्मा की कहानियाँ उस स्त्री की कथा कहती हैं जो ना केवल अपनी भूमिका से बंधी है, बल्कि अपनी पहचान के लिए छटपटाती भी है। ये कहानियाँ घर के भीतर की उन संकरी गलीयों की पड़ताल करती हैं, जहाँ स्त्री होना एक उत्तरदायित्व नहीं, एक दंड जैसा महसूस होता है। लेखिका का दृष्टिकोण कहीं भी रोमैंटिक नहीं होता, बल्कि बेहद यथार्थपरक और भीतर तक धँसता हुआ है। स्त्री को सहानुभूति नहीं, समझ की ज़रूरत है — यही संदेश इन कहानियों की अंतर्धारा है।”

Read More