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परिवार के बीच अपनी पीड़ा छिपाती भावुक भारतीय महिला की यथार्थवादी छवि

विष वमन

राजेश्वरी ने परिवार की खुशियों के लिए अपनी पीड़ा को वर्षों तक भीतर दबाए रखा। रिश्तों में मिले विश्वासघात और शोषण का विष आखिर कितना सहा जा सकता है? यह कहानी उसी अनकही पीड़ा और मौन आह की मार्मिक अभिव्यक्ति है।

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लाल टेशू के फूलों से लदे पेड़ की डाल पर बैठी एक अकेली स्त्री की परछाईं, पृष्ठभूमि में धुंधला बियाबान जंगल

उसने चाहा प्रेम…

यह कविता स्त्री की उन अधूरी इच्छाओं की कहानी कहती है जिन्हें समाज ने अपराध, पाप या विद्रोह घोषित कर दिया। प्रेम, सौंदर्य, आध्यात्म और स्वतंत्रता की चाह रखने वाली स्त्री हर मोड़ पर दंडित होती रही लेकिन अंततः वह अपनी ही आग में एक नई सत्ता बनकर उभरती है।

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शब्दों का आचरण

यह लघुकथा ज्ञान और आचरण के अंतर को उजागर करती है। जो ऋषि संसार को करुणा का उपदेश देता है, वही अपने घर में उसे जी नहीं पाता। अंततः शब्दों की खोखली चमक टूटती है और सच्चे आत्मबोध का जन्म होता है पर एक अपूरणीय क्षति के साथ।

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