
‘अर्चना अश्क मिश्रा ‘
सच जानने की फुर्सत किसे है,
अफवाहों का शोर जारी है।
हम सब गूंगे-बहरे हुए,
इन्सानियत का मरना जारी है।
मानवता भी अब शर्मसार हुई,
खुद का ही घर फूँकना जारी है।
लहू भी अब जर्द हो चला,
खुद में खुद का मरना जारी है।
धर्म, कौम, मजहब का पता नहीं,
बस तमाशा देखना जारी है।
क्या सब कुछ लुटाकर ही चेतेंगे हम?
सभी का धृतराष्ट्र बनना जारी है।
हे कृष्ण! कहाँ हो तुम…?
महाभारत का युद्ध जारी है।।
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बहुत ही उत्कृष्ट प्रस्तुति है आदरणीया 👌
हार्दिक आभार 💐💐