
अर्चना ज्ञानी, उज्जैन
कर्मनिष्ठा और निरंतर प्रयास से
उच्च शिखर पर बढ़ती रहो।
अपनी लक्ष्मण-रेखा
स्वयं खींचकर,
मान-सम्मान की गरिमामयी
घृत-दीपज्योति बनो।
पवित्र आँगन की श्याम तुलसी,
चौरे की राम तुलसी जैसी मर्यादित,
सागर-सी गंभीरता,
आकाश-सी विशालता लिए,
नभ में अरुंधति-सी चमकती रहो।
मेरे आँगन में हल्दी-कुंकू की रंगोली-सी
सदा तुम दमकती रहो।
मेरे पावन संस्कारों में पली,
चेहरे पर मर्यादा-मोहिनी सजाए,
सदा तुम चहकती रहो।
माँ गौरी का केशर-चंदन
और भस्मी बाबा भोलेनाथ के
सुखद आशीषों से
हमेशा सराबोर रहो।
रिमझिम सावन की मधुर फुहारों से
निशिदिन भीगती रहो।
माता-पिता के आत्मसम्मान की रजनीगंधा बन,
मेरे मन की क्यारी में
रोज-रोज महकती रहो…
मेरी बेटी, सदा तुम खुश रहो…!
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