
दिव्या सिंह, प्रसिद्ध लेखिका
किसको कंधों पर ढोओगे,
किसको तुम पार उतारोगे?
मझधार में नैय्या डूबेगी,
तो किस-किस को तुम तारोगे?
क्या सबको साथ में मारोगे?
सब डूब गए तो क्या होगा,
फिर किस पर राज करोगे तुम?
तुम हुक्म चलाओगे किस पर,
किसका उद्धार करोगे तुम?
क्या तुमको यह एहसास नहीं,
तुम भी तो एक दिन हारोगे—
क्या सबको साथ में मारोगे?
भारत के आँचल में सब हैं,
हर जाति-धरम मिलता है यहाँ।
इसकी धरती में ताक़त है,
कीचड़ में कमल खिलता है यहाँ।
एक दिन ऐसा भी आएगा,
अपनी ही ताक़त से हारोगे—
क्या सबको साथ में मारोगे?
जो आप कहें, वही सच होगा,
हम तो ग़रीब जन हैं साहब।
हम जाति-वाती क्या जानें,
हम तो उज्ज्वल मन हैं साहब।
क्या इस चुनाव में भी हम पर,
तुम आकर डोरे डालोगे?
क्या सबको साथ में मारोगे?
इन रचनाओं को भी पढ़ें और अपनी प्रतिक्रियाएं अवश्य दें
मुन्ना से कीर्ति राणा
ईशमधु तलवार स्मृति शाकुन्तलम सम्मान 2026 जयपुर की लेखिका संतोषी को
सफ़र की यादें
मेरी अर्थी
जीवनधारा: बदनाम गली में इंसानियत की तलाश
‘रिहाई’
वर्तमान की गुफ्तगू
मुन्ना से कीर्ति राणा
प्यार का इंतज़ार

Bahut achchi kavita
Thanks 🙏
Bahut achchi kavita
Thanks 🙏
शानदार पंक्तियां….देश में विषम परिस्थितियों को दृष्टिगत प्रासंगिक कविता…..शायद देश के नीति बनाने वाले लोगों को समझ में आ जाए ।
Wonderful
Thanks sir
Thanks 🙏
बहुत सुन्दर
Aap sbhi ka hriday se dhanyawad.
Thanks ma’am
बहुत सुन्दर
Lovely.. a well deep thought penned poem. Very well.
Thanks
Thanks sir
Aap सभी का हृदय से शुक्रिया।
Thanks 🙏
Aap sbhi ka hriday se dhanyawad.