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विश्व में हिंसा और होली के विरोधाभास को दर्शाता प्रतीकात्मक दृश्य

जब रंग हुए लाल

यह कविता विश्व में फैलती हिंसा, नकली व्यवहार और टूटते मानवीय मूल्यों पर तीखा प्रश्न उठाती है। होली और रमज़ान जैसे पावन अवसरों के बीच खून-खराबे की विडंबना को उजागर करती एक मार्मिक सामाजिक रचना।

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किसको ढोओगे

यह कविता सत्ता के अहंकार, चुनावी राजनीति और सामाजिक विभाजन पर तीखे सवाल खड़े करती है। “किसको ढोओगे” आम जनता की आवाज़ बनकर लोकतंत्र के मूल्यों की याद दिलाती है।

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