किसको ढोओगे
यह कविता सत्ता के अहंकार, चुनावी राजनीति और सामाजिक विभाजन पर तीखे सवाल खड़े करती है। “किसको ढोओगे” आम जनता की आवाज़ बनकर लोकतंत्र के मूल्यों की याद दिलाती है।

यह कविता सत्ता के अहंकार, चुनावी राजनीति और सामाजिक विभाजन पर तीखे सवाल खड़े करती है। “किसको ढोओगे” आम जनता की आवाज़ बनकर लोकतंत्र के मूल्यों की याद दिलाती है।
मेहनत और आत्मसम्मान के बल पर आगे बढ़ी मीना, शोध के दौरान अपने मार्गदर्शक राहुल से प्रेम कर बैठती है। तीन वर्षों के संबंध के बाद राहुल जाति-घमंड और स्वार्थ के आगे प्रेम को नकार देता है। मीना के सपने, विश्वास और आत्मा सब एक साथ टूट जाते हैं, और वह सामाजिक क्रूरता का नंगा सच देखती है।
प्रेम हो जाना किसी प्राकृतिक आपदा से कम नहीं है। ये मर्जी से नहीं आता, पर बहुत कुछ उजाड़ सकता है। जैसे नदियां लौट आती हैं अपने पुराने रास्तों पर, प्रेम भी तमाम वर्जनाओं को पार कर अपना रास्ता बना लेता है। प्रेम कोई पूर्णता नहीं, कोई गणना नहीं – ये मिट्टी की गंध, सूरज की तपिश और चाँदनी की ठंडक सा है। मैं नहीं जानती प्रेम क्या है, बस इतना जानती हूं कि इसकी खोज अनंत है – इस दुनिया के बाद की किसी नई दुनिया तक।