
सुरेखा अग्रवाल, स्वरा
स्त्रियों ने ठान ली है….
हदें बेहिचक, शर्म के लिफ़ाफ़े को त्याग,
छोड़ देंगी पल भर में वे हर वह इम्तिहान,
जिसमें देनी पड़ेगी उन्हें हर तरह की अग्निपरीक्षा।
इच्छा के विरुद्ध लड़ेंगी वे समाज से,
अपने हक़ की ख़ातिर, अपने सुदृढ़ अस्तित्व को बचाने।
भर हुंकार समाज की युद्धभूमि में,
निकल पड़ेंगी अपने रणक्षेत्र से बाहर।
सुनो, द्रौपदी को पछाड़कर, सीता को नकारकर,
अपने राम के विरुद्ध और so-called मर्यादाओं के परे,
रचेंगी एक पेचीदा इतिहास
अपने बाग़ी होने का।
अनचाही देह की दृष्टि को नज़रअंदाज़ कर
उठा लेंगी वे ब्रह्मास्त्र अपने शील का,
और काट देंगी वे हाथ,
जो उठेंगे उनके चरित्र के ख़िलाफ़।
हाँ, अब तय है कि नहीं डरेंगी वे
किसी भी युद्ध से,
जो रोके रखता है उन्हें
देह की ख़ातिर।
नहीं चाहतीं वे पूजना स्वयं को किसी से,
अब वे ख़ुद स्थापित होंगी
अपने बलबूते पर,
हर उस रणक्षेत्र में
जो उनके लिए वर्जित है,
जो उनके लिए वर्जित है।
सुनो,
नहीं चाहिए राम,
नहीं चाहिए कृष्ण।
वे स्वयं शिवि हैं,
वे अपने आप में कृष्णा हैं,
ख़ुद में मथुरा,
ख़ुद में लिए एक मणिकर्णिका।

बहुत सशक्त लिखा स्वरा
ऐसा ही होना चाहिए। अबला बनकर नहीं रहना चाहिए। मर्यादा में रहते हुए सबला बनो। महिलाओं को भी अपनी पहचान बनाने का हक है।
राधा गोयल
Bahut khoob