स्त्री अस्मिता और आत्मनिर्भरता का प्रतीक एक दृढ़ निश्चयी भारतीय महिला, जो युद्धभूमि में आत्मविश्वास के साथ खड़ी होकर सामाजिक बंधनों और रूढ़ियों को चुनौती देती दिखाई दे रही है।

स्त्रियों ने ठान ली है…

यह कविता स्त्री के आत्मसम्मान, स्वाभिमान और आत्मनिर्णय की प्रखर घोषणा है। इसमें वह हर उस सामाजिक बंधन, अग्निपरीक्षा और दोहरे मापदंड को चुनौती देती है, जो सदियों से उसके अस्तित्व को सीमित करते आए हैं। यह केवल विद्रोह नहीं, बल्कि अपने अधिकारों, पहचान और स्वतंत्र व्यक्तित्व की निर्भीक उद्घोषणा है।

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