स्त्री अस्मिता और आत्मनिर्भरता का प्रतीक एक दृढ़ निश्चयी भारतीय महिला, जो युद्धभूमि में आत्मविश्वास के साथ खड़ी होकर सामाजिक बंधनों और रूढ़ियों को चुनौती देती दिखाई दे रही है।

स्त्रियों ने ठान ली है…

यह कविता स्त्री के आत्मसम्मान, स्वाभिमान और आत्मनिर्णय की प्रखर घोषणा है। इसमें वह हर उस सामाजिक बंधन, अग्निपरीक्षा और दोहरे मापदंड को चुनौती देती है, जो सदियों से उसके अस्तित्व को सीमित करते आए हैं। यह केवल विद्रोह नहीं, बल्कि अपने अधिकारों, पहचान और स्वतंत्र व्यक्तित्व की निर्भीक उद्घोषणा है।

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नारी शक्ति का प्रचंड रूप, दुर्गा और काली के स्वरूप में अन्याय के खिलाफ खड़ी महिला

रूदन नहीं हुंकार चाहिए

यह कविता नारी के उस रूप को उजागर करती है जो केवल सहन नहीं करती, बल्कि अन्याय के खिलाफ हुंकार भरती है। जब अत्याचार सीमा पार करता है, तो वही नारी काली, दुर्गा और लक्ष्मीबाई बनकर अन्याय का अंत करती है।

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दादी की बिंदी…

गांव के फेरीवाले से सुर्ख लाल बिंदी खोजता दादा, दरअसल अपने प्रेम और सम्मान को जीवित रखना चाहता है। बहू की कठोरता के बीच दादी का स्वाभिमान और दादा का निश्छल प्रेम सामने आता है, जब वह स्वयं दादी के माथे पर बिंदी लगाता है—जैसे वर्षों बाद पूर्णिमा का चाँद खिल उठा हो।

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