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दादी की बिंदी…

श्रीमती विजयलक्ष्मी सिंह, प्रसिद्ध लेखिका

जैसे ही गांव में फेरीवाला, बिसाती, काँच की चूड़ियाँ, रंगबिरंगी बिन्दियाँ, रबर बैंड,बालों में लगाने की क्लिप, सिंदूर, शीशा, कंघी लेकर बोलता हुआ गांव मे आया “बिंदी ले लो, चूड़ी ले लो“। गांव की बहू-बेटियां पैसे लेकर फेरीवाले से सामान लेने दौड़ पड़ीं। “कितने की हैं
चूड़ियाँ, बिंदियाँ भईया ?”
“क्या तुम पैसे के बदले अनाज भी लेते हो भईया ?” गांव की महिलाओं ने प्रश्न किया ? “पहले सामान तौ देखौ भौजी”बिसाती ने कहा “पहले पसन्द तौ करौ। सब सामान ऐ वन है। देखि कै पसन्द करौ। सुन्दर-सुन्दर हेयर-बैंन्ड है बिटियन के लिये।” अभी औरतें बिसाती का सामान देख ही रही थीं कि एक बूढ़े बाबा हाथ में डंडा लिये दौड़े-दौड़े आए और बिसाती से पूछने लगे “बेटा क्या तुम्हारे पास सुर्ख लाल रंग की बिंदी है?”
बिसाती ने कहा दादा जी बिन्दियाँ बहुत सुन्दर-सुन्दर हैं, आप पसन्द करि लेवो।”
फेरी बाला बिंदियों के डिब्बे खोल कर दादा जी को दिखाता रहा, पर दादा जी को कोई बिन्दी पसन्द नहीं आ रही थी ।
दादा जी हताश होकर बोले, “बेटा, जो बिन्दी हमें चाहिए वो शायद तुम्हारे पास नहीं है।”
दादा जी को इस उम्र में इतना आतुर देखकर औरतें एक दूसरे के कानों में खुसर-फुसर करने लगीं “इस उम्र में दादा जी भला किसके लिये बिन्दी ख़रीदने को व्याकुल हैं। बिन्दी वाला जब बिन्दी दिखा-दिखा कर परेशान हो गया तो बोला, “दादा जी हमारा समय बर्बाद कर रहे हो कि ख़रीदना भी है?” झुँझलाकर फेरी वाला बोला, “रुकिये एक पत्ता बचा है दिखाने को सो वो भी देख लीजिए, शायद आप को पसन्द आ जाए।” उसने जब बड़ी, सुर्ख लाल रंग की बिन्दियों का का पत्ता निकाला तो दादा जी ने ख़ुश होकर झटके से वह बिन्दी का पत्ता ले लिया और घर की ओर यह बोलकर चल दिये कि पैसे घर से भिजवाता हूँ ।
फेरीवाला बोला “ठीक है दादा जी।”
दादा जी घर की ओर लपके जा रहे थे। घर पहुँचे तो देखा कि उनकी बड़ी बहू भी बिसाती के पास जाने को निकल रही थी तो दादा जी ने बहू से कहा, “बेटा बिसाती से मैं एक सामान लाया हूँ, उसे दस रुपये दे देना तो “
बहू त्योरियाँ चढ़ा कर बड़बड़ाने लगी और बोली “हमरे तीर पैसा कहाँ धरा है। जब देखौ तब पैसा माँगा करत हैं। न कुछ कमाय न धमाय है। दिन भर पैसा चाहीं जानो पैसा कै कुँआ खुदा है।”
सामने मूँज की खटिया पर बैठी दादी ,बहू का दादा जी को बेअदबी से बड़बड़ाना सुन रही थीं।
दादी बोलीं “का बहुअन से पैसा माँगत
नीक लागत है तुमका ?“ कहाँ उनके लगे धरा है पैसा। पर उन्हें बहू का बेअदबी से बोलना बिलकुल गवारा नहीं था ।
दादा जी बोले ल्यो बिन्दी लाये हन तुमरे खातिन। लगाय लेव, कितने दिनन से तोहार माथा सूना रहा, आज तोहरे पसन्द की बिन्दी मिल गई। दादी तुरन्त चारपाई से उतरीं और भीतर कमरे में गई बक्सा खोला और कपड़े के बटुये से दस
रुपये का नोट निकाला और पोते से बिसाती को भिजवा दिया।स्वाभिमानी दादी बोली “सुहाग की चीज़ है बिना पैसे के नहीं लेना चाहिये “ जब दादी ने ग़ुस्से से बिन्दी नहीं लगाई, तो आगे बढ़ कर दादा जी ने दादी के माथे पर अपने हाथ से बिन्दी लगा दी और दूर खड़े होकर दादी को ऐसे निहारने लगे जैसे बहुत दिनों की बदली के बाद आज अचानक पूर्णमासी का चाँद निकल आया हो ।

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