Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers
पूर्णिमा की शांत रात में भारतीय शहर की एक संकरी गली, सामने खेतों के ऊपर उगता सुनहरी रोशनी से दमकता चाँद, धुंध में नहाया स्ट्रीट लाइट और हल्की एम्बर रोशनी में चमकते घर; माहौल में सादगी, स्मृति और अपनापन झलकता है।

पून्नो का चाँद

यह रचना पूर्णिमा की रात के एक दुर्लभ दृश्य को माँ की लोकबोली से जोड़ती है। चाँद सिर्फ आकाशीय पिंड नहीं रह जाता, बल्कि स्मृतियों, रिश्तों और भाषा के स्नेहिल स्पर्श में बदल जाता है—जहाँ “पूर्णिमा” माँ के लिए “पुन्नो” बन जाती है।

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दादी की बिंदी…

गांव के फेरीवाले से सुर्ख लाल बिंदी खोजता दादा, दरअसल अपने प्रेम और सम्मान को जीवित रखना चाहता है। बहू की कठोरता के बीच दादी का स्वाभिमान और दादा का निश्छल प्रेम सामने आता है, जब वह स्वयं दादी के माथे पर बिंदी लगाता है—जैसे वर्षों बाद पूर्णिमा का चाँद खिल उठा हो।

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