
डॉ. आशासिंह सिकरवार, प्रसिद्ध लेखिका, अहमदाबाद
एक दिन
वे लौटेंगे हजारों-हजारों में
लाखों में होंगे
दिशाओं से
जंगलों से
पगडंडियों से होते हुए
आएंगे
गली- कूचे से
गाँव-गाँव
तनी हुई मुट्ठीयां के साथ
एक ही स्वर में
एक ही आवाज़ बनकर
अपने हक़ के लिए
खड़े होंगे
जो अभी बिखर गए हैं
चले गए हैं दिशाओं में
अनंत यात्राओं में हैं
राह में छूट गए हैं चिन्ह
एक दिन
उसी पथ से लौटेंगे
भूख को मुट्ठी में भींच कर
तनकर खड़े होंगे
हजारों
होंगे लाखों में
एक्य स्थापत्य करते हुए
सुगठित
जीवन की उदभावना लिए
कि बो देंगे बीज इंसान के भीतर
अन्याय के खिलाफ …

बहुत खूबसूरत रचना हर एक पंक्तियां दिल को छू सी गई।