न्यायालय में कटघरे में खड़ी एक गर्भवती महिला, सामने न्यायाधीश और गंभीर माहौल।

आश्वासन

‘आश्वासन’ एक ऐसी मार्मिक हिंदी कहानी है, जिसमें एक माँ अदालत के सामने अपनी अजन्मी बेटी की सुरक्षा को लेकर सवाल उठाती है। यह कहानी केवल कन्या भ्रूण-हत्या पर नहीं, बल्कि समाज, कानून और महिला सुरक्षा की वास्तविक स्थिति पर गहरा चिंतन प्रस्तुत करती है। अंत का प्रश्न पाठक के मन में लंबे समय तक गूंजता रहता है।

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‘मन निर्मोही’

स्वाभिमान की चोट से आहत मन ने पहले सहजता से सहा, फिर आक्रोशित होकर न्याय की उम्मीद में संघर्ष किया। विश्वविद्यालय और सचिवालय की सीढ़ियाँ चढ़ते-उतरते उसने सच्चाई के दबे-सिसकते स्वर को देखा। छल और प्रपंच के बीच भी उसने सिद्धांतों को नहीं छोड़ा। परंतु जब न्यायालय की प्रक्रिया भी ठंडी पड़ी मिली, तो अंततः मन निर्मोही हो गया।

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