स्वाभिमान का खून
“बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” का नारा क्या सिर्फ दिखावा बनकर रह गया है? यह लेख बेटियों की सुरक्षा, शिक्षा और सम्मान की जमीनी सच्चाई को उजागर करता है।

“बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” का नारा क्या सिर्फ दिखावा बनकर रह गया है? यह लेख बेटियों की सुरक्षा, शिक्षा और सम्मान की जमीनी सच्चाई को उजागर करता है।
आज औरतें रॉकेट से लेकर एयरप्लेन तक उड़ा रही हैं, और फिर भी कुछ लोग स्कूटी चलाने पर सवाल उठाते हैं। सच तो यह है कि समस्या लड़कियों की ड्राइविंग नहीं, बल्कि कुछ लोगों की नीयत और सोच में है। हम औरतें हवा में अपने पंख फैलाकर आगे बढ़ती रहेंगी .किसी को मिर्ची लगे तो लगे।
यह लेख भारतीय समाज में महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों और जनजाति समुदायों के खिलाफ बढ़ते अपराधों पर केंद्रित है। एनसीआरबी के 2023 के आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं के खिलाफ अपराधों में लगातार वृद्धि हुई है, जिसमें घरेलू हिंसा, दहेज हत्याएं, अपहरण, बलात्कार और छेड़छाड़ के मामले प्रमुख हैं। बच्चों पर अत्याचारों में भी तेज़ी से वृद्धि हुई है, और बुजुर्ग व जनजाति समुदाय भी सुरक्षित नहीं हैं। लेख में यह भी बताया गया है कि केवल कानून और पुलिस की तत्परता ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि समाज में पुरुष प्रधान मानसिकता को बदलना और महिलाओं व बच्चों की सुरक्षा के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाना अनिवार्य है। यह स्थिति संकेत देती है कि सामाजिक और मानसिक स्तर पर व्यापक सुधार की आवश्यकता है।
कविता में एक अनजानी और अबोध आत्मा की पुकार है, जो जन्म लेने से पहले ही अपने जीवन की चुनौतियों और समाज में बढ़ती खतरे की भविष्यवाणी करती है। यह भावनात्मक रचना बताती है कि कैसे एक बच्चा, अपनी मासूमियत में, पहले से ही सुरक्षा और संरक्षण की लालसा रखता है, और कैसे वह अपनी सुरक्षा के लिए माता-पिता से प्रार्थना करता है कि उसे जन्म से पहले ही सुरक्षित स्थान पर रखा जाए। यह कविता सामाजिक चेतना और संवेदनशीलता को उजागर करती है।