पापा, मुझे विदा कर दो…

रविसिंह राजपूत, रचनाकर, हापुड़

पापा, मुझे अभी विदा कर दो
अभी तो माँ के गर्भ में हूँ।
जन्म लेकर जब चलने लगूँगी,
तभी से अच्छी-बुरी नज़रें
पड़ने लगेंगी मेरी देह पर।

कैसे फ़र्क कर पाऊँगी
अच्छे-बुरे स्पर्श में?
कैसे रोक पाऊँगी लिज़लिज़े हाथों को
मेरी अबोध काया पर
रेंगने से?

इन्हीं अच्छे और कुत्सित
हाथों को कैसे पहचानेगा
मेरा अबोध मन?
और इसी अज्ञान की छाँव में
दिन-ब-दिन बढ़ती देह
नित कामुक, कुत्सित नज़रों को
पहचान कर भी
बढ़ते रहना होगा
चुपचाप नज़रें झुकाकर।

कोई अनहोनी मेरे साथ न हो,
मेरे नित घर से निकलते ही
यही डर सताएगा आपको।
तो सोच रही हूँ पापा,
मैं क्यों डालूँ आपको उलझन में?
इससे अच्छा है
मुझे पैदा ही मत होने दो।

माँ की कोख में ही
चिरनिद्रा में सुला दो।
पालने की, बड़े होने की,
घर सुरक्षित पहुँचने की, पढ़ाई की,
शादी की चिंताएँ
मत पालो।

माँ की कोख में ही
पापा, मुझे विदा कर दो।
पापा, मुझे विदा कर दो।

2 thoughts on “पापा, मुझे विदा कर दो…

  1. स्त्री मन के डर को बहुत अच्छे से उकेरा है।मार्मिक!

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