बादल फटने की त्रासदी

राकेश चंद्रा, प्रसिद्ध साहित्यकार, लखनऊ

वर्ष 1983 की यह घटना मेरी प्रशासनिक सेवा के दौरान प्रथम तैनाती अल्मोड़ा जनपद, जो अब उत्तराखंड राज्य का जिला है, से संबंधित है। तत्समय इस नये राज्य का गठन नहीं हुआ था और पहाड़ों के जनजीवन को नज़दीक से देखने व परखने का मेरे लिए यह प्रथम अवसर था। हाल के दिनों में मुख्यतः उत्तराखंड व हिमाचल प्रदेश में बादल फटने की कई घटनाएँ घटित हुई हैं, जिनमें भारी मात्रा में जन-धन हानि हुई है। पहाड़ों में भूस्खलन, बादल फटना आदि घटनाएँ अक्सर होती रहती हैं; यह मैंने तब जाना था।

अल्मोड़ा की एक तहसील बागेश्वर स्थित एक दूरस्थ गाँव करमी में बादल फटने की एक घटना उसी समय प्रकाश में आई और मुझे अपनी टीम के साथ वस्तुस्थिति का आकलन करने तत्काल करमी गाँव में पहुँचने का आदेश प्राप्त हुआ। बारह हज़ार फीट की ऊँचाई पर बसे इस गाँव में पैदल जाकर बादल फटने से हुई क्षति का आकलन करना मेरे लिए बिल्कुल अलग अनुभव था। वहाँ तक पहुँचने का एकमात्र रास्ता पगडंडियों वाला था और काफी घुमावदार था।

मुझे वहाँ जाने का आदेश मिलते ही मैं तैयार होकर अगले दिन अपने सहकर्मियों के साथ यात्रा पर निकल पड़ा। पहले दिन हम लोग बागेश्वर तहसील के कपकोट विकासखण्ड मुख्यालय पहुँच गए। वहाँ का डाक बंगला एक पहाड़ी नदी के किनारे बना हुआ था। भोजनोपरान्त मैं पूरी रात सो नहीं सका। उस नदी के बहने से जो ध्वनि निकल रही थी, वह बहुत डरावनी थी—गड़गड़ाहट से परिपूर्ण! मैंने पहली बार किसी नदी को इस प्रकार बहते और शोर करते हुए सुना था।

अगले दिन प्रातःकाल स्वल्पाहार के उपरांत हम लोग पैदल मार्ग पर चल दिए। जैसे-जैसे ऊँचाई बढ़ती जा रही थी, ऊपर चलना और कठिन होता जा रहा था। रास्ते में कुछ दूरी पर गाँव बसे हुए थे जो अपना सामान्य जीवन तमाम अभावों के बीच जी रहे थे। और अधिक ऊँचाई पर पहुँचने पर ऐसा लगा कि शायद हम लोग किसी और लोक में आ गये हों! बिल्कुल नई दुनिया थी यह मेरे लिए! उनके मकानों की बनावट, उनकी वेष-भूषा, आचार-व्यवहार—सब कुछ अनूठा था।

पर उस समय मोबाइल फोन या कैमरे का आविष्कार नहीं हुआ था, अन्यथा उस समय के चित्र आज भी रोमांच जगाने में सक्षम होते। हम लोग बिना अधिक रुके आगे बढ़ते रहे और तीसरे दिन करमी गाँव पहुँच गए। वहाँ का दृश्य एकदम अलग था। गाँववालों ने बताया कि निकटवर्ती पहाड़ी पर एक काफी बड़ा बोल्डर, जो सम्भवत: एक मध्यम आकार के कमरे में समा सकता था, काफी समय से वहीं पड़ा हुआ था। बादल फटने से इतना बड़ा बोल्डर अपनी जगह से खिसक कर नीचे बहने वाले गदेरे (नाले) में जा गिरा और नाले के नैसर्गिक प्रवाह को अवरुद्ध कर दिया।

फलस्वरूप, गदेरे का पानी बाढ़ की शक्ल में ऊपर आ गया और इसका प्रवाह इतना तेज़ था कि पलक झपकते ही पूरा गाँव बह गया। वहाँ गदेरे के किनारे एक दोमंजिला पक्का मकान था। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, मकान में रहने वाले एक व्यक्ति का कटी हुई हथेली दूर गदेरे के आँचल में मिली, जिसमें कुछ फुटकर रुपये मुठ्ठी में बँधे हुए थे। अर्थात वहाँ रहने वाले उस व्यक्ति को इतना समय भी नहीं मिला कि वह हाथ की मुठ्ठी में बँधे रुपयों को कहीं सुरक्षित रख पाता।

कई लोगों के कटे अंग मिले, जो दूर बहकर चले गए थे, परन्तु किसी व्यक्ति का पूरा मृत शरीर नहीं मिला। जहाँ दोमंजिला मकान था वहाँ ज़मीन समतल हो चुकी थी। पूरा परिदृश्य काफी झकझोर देने वाला था। पूरा गाँव दहशत में सराबोर था। मैंने पहली बार बादल फटने की इस त्रासदी को देखा, जो मेरे मानस पटल पर आज भी जीवंत है।

हम लोगों ने उन लोगों की बातें सुनीं, जो अधिक मुआवजे की माँग कर रहे थे। इसके अतिरिक्त और भी समस्याएँ थीं, जिनको नोट करके हम वहाँ कुछ समय रुकने के उपरांत वापसी की ओर चल पड़े।

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