मुआवज़ा

गंगा घाटी की बाढ़ ने न जाने कितने घर उजाड़ दिए। लोचू के पिता भी उसी बाढ़ में लापता हो गए। तीन दिनों से परिवार उनकी खोज में भटक रहा था। घर में मातम था, पर जब टीवी पर “मुआवज़े” की खबर चली — 94 लाख रुपए का — तो लोचू की प्रार्थना बदल गई। अब उसके भगवान से माँग पिता की सलामती नहीं, बल्कि मुआवज़े की रकम की थी।

Read More

बरसात में…

बरसात को जीवन, प्रकृति और मानवीय अनुभवों का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत किया गया है। बारिश की बूंदें पत्तों और फूलों पर मोती की तरह टपकती हैं, बिजली के तारों पर झिलमिलाती हैं और धरती में अमृत जैसी बूंदों के रूप में समा जाती हैं। वहीं, जर्जर मकान ढहते हैं और लोग अपने घरों और यादों को बचाने के लिए प्रयास करते हैं। शहर और गाँव की सड़कों पर बच्चे बारिश में खेलते हैं, नदियाँ अपने भीषण बहाव में सब कुछ बहा लेती हैं, और जानवर तथा पक्षी अपनी परिस्थितियों से जूझते हैं। इसके बीच, बरसात जीवन में रिश्तों, साहस और मानवीय संवेदनाओं को पुनर्जीवित करती है। कविता यह दर्शाती है कि बरसात का सौंदर्य और जीवन में उसकी भूमिका पहले जैसी रह गई है, लेकिन अब वह पहले जैसी रूमानी नहीं लगती।

Read More

बादल फटने की त्रासदी

वर्ष 1983 में मेरी प्रथम प्रशासनिक तैनाती के दौरान अल्मोड़ा जिले के दूरस्थ करमी गाँव में घटित बादल फटने की घटना ने मुझे पहाड़ों में जीवन और प्राकृतिक आपदाओं की भयावहता का जीवंत अनुभव कराया। पैदल मार्ग से उच्च पहाड़ी इलाक़ों तक पहुँचना कठिन था, लेकिन गाँववालों की व्यथा और घटना के दृश्य ने मेरी संवेदनाएँ झकझोर दीं। इस घटना में लोगों के घर बह गए, कई लोग घायल हुए और मृतक भी हुए। उस समय का अनुभव आज भी मेरी स्मृति में जीवंत है और यह प्रशासनिक कार्य के दौरान मिली असली चुनौती और सीख का प्रतीक बना।

Read More