सुनो बुद्ध…

यशोधरा आधी रात के शांत राजमहल में अपनी गोद में शिशु राहुल को लिए खड़ी हैं। उनकी आँखों में गहरा दर्द, अकेलापन और आत्मसम्मान झलक रहा है। खिड़की से आती चांदनी उनके चेहरे को प्रकाशित कर रही है, जबकि पृष्ठभूमि में खुला द्वार सिद्धार्थ के प्रस्थान का प्रतीक है। दृश्य त्याग, विरह, मातृत्व और आंतरिक शक्ति की मार्मिक अनुभूति कराता है।

अनामिका अर्श

आसान है बहुत, सिद्धार्थ का बुद्ध हो जाना…

क्या नामुमकिन है…?

यशोधरा का बुद्धत्व को उपलब्ध हो जाना…?

क्या उचित था अर्धरात्रि में पत्नी/नवजात पुत्र को त्यागकर अपने आत्मकल्याण के लिए चुपके से निकल जाना…?

कितना मुश्किल रहा होगा यशोधरा के लिए, बेगुनाह परित्यक्त हो जाना…?

काश, सुजाता के बनाए खीर की बजाय यशोधरा के प्रेम से बनाए पकवान से सिद्धार्थ को बुद्धत्व उपलब्ध होता…

तो पलायनवादी को जिम्मेदारी में मोक्ष दिखता।

ईश्वर-रचित सृष्टि, सनातनी वैवाहिक संस्था का अपमान न होता…

किसी यशोधरा का तिरस्कार नहीं, सम्मान होता।

गर संसार और गृहस्थी में स्थितप्रज्ञता न आई, तो वनों-पहाड़ों में कैसे आएगी…?

तन भगोड़ा होगा, मन को कैसे पिंजरे में रख पाओगे…?

बुद्ध, आपके उपदेश—प्रेम, अहिंसा—निःसंदेह मनुष्यता के प्राण हैं…

फिर यशोधरा को क्यों त्राण नहीं है…?

आप तो मध्यमार्गी थे, फिर क्यों न साध पाए गृहस्थी और संन्यास में समन्वय…?

संन्यास पलायन से मिलता तो हर भगोड़ा संन्यासी होता।

बहुत आसान है पलायनवादी हो जाना…

कठिन है बहुत—जीवन में रहकर जीवन से विमुख हो जाना।

अपने कर्तव्यों से पदच्युत होकर कैसे ज्ञान के पात्र बनेंगे हम…?

सप्तपदी के सात वचनों की अवहेलना कर कैसे धर्म का अनुसरण करेंगे हम…?

बेहतर होता, आप अपनी धर्मपत्नी से पूर्णतः संबंध तोड़ जाते; नवजात शिशु को गोद में देकर यशोधरा को यूँ अधर में न छोड़ जाते…

तारीफ़ तो तब थी, जब अपने कल्याण के साथ अपनी धर्मपत्नी के आत्मकल्याण का मार्ग भी खोल जाते…

‘अप्प दीपो भव’ का सिद्धांत दिया आपने संसार को, और अपने ही घर में अंधेरा कर गए…?

पारिवारिक जीवन को तबाह कर कैसे स्वस्थ, संवेदनशील समाज की संरचना करेंगे हम…?

संन्यास जन्म लेता है कुरुक्षेत्र के महासमर में, श्रीकृष्ण की गीता से—

“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन”….

दो कौड़ी का है—सर मुँड़ा या केश बढ़ाए, गेरुआ पहन तन का संन्यासी दिखाना।

अमूल्य है मन का बैरागी हो जाना, जनक सा विदेह हो जाना।

सोलह हज़ार 108 रानियों/पटरानियों के बीच ब्रह्मचर्य का मिसाल बन जाना…

राधा-कृष्ण/अर्धनारीश्वर के दिव्य प्रेम की अनुभूति कराना…

माफ करना बुद्ध, मुझे आपका उपदेश मन, कर्म और वचन में विरोधाभास का आभास कराता है…

चिढ़ाता है।

यशोधरा का दर्द मुझे द्रवित कर जाता है….

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4 thoughts on “सुनो बुद्ध…

    1. सादर धन्यवाद हृदयतल से आपका आदरणीय 🙏🙏🥰🌷

  1. अहा अद्भुत बेहद खूबसूरती से आपने मेरी रचना को प्रकाशित किया है आदरणीय श्री सुरेश परिहार जी संपादक Live Wire News 👌🥰….., सादर धन्यवाद , आत्मीय आभार हृदयतल से आपका आदरणीय 🙏🥰🌷।

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