सुनो बुद्ध…
यह कविता यशोधरा के दृष्टिकोण से बुद्ध के संन्यास पर प्रश्न उठाती है। प्रेम, कर्तव्य, गृहस्थ जीवन और आत्मकल्याण के बीच के द्वंद्व को संवेदनशीलता से प्रस्तुत करती है।

यह कविता यशोधरा के दृष्टिकोण से बुद्ध के संन्यास पर प्रश्न उठाती है। प्रेम, कर्तव्य, गृहस्थ जीवन और आत्मकल्याण के बीच के द्वंद्व को संवेदनशीलता से प्रस्तुत करती है।
नागदा में आयोजित धर्मसभा में मुनिराज श्री डॉ. संयमरत्न विजय जी म.सा. ने कहा कि मनुष्य जन्म चिंतामणि रत्न के समान दुर्लभ है। उन्होंने जिनेंद्र भक्ति, वैरभाव त्याग और आत्मा को निर्मल बनाने के महत्व पर प्रकाश डालते हुए धर्म को जीवन का वास्तविक मार्ग बताया।