अगर मैं किसी सुबह न उठूँ…

जिस सुबह वह नहीं उठी, वह हार नहीं थी वह एक चुप विदाई थी।रोज़ के झगड़ों, टूटती उम्मीदों और खुद को खो देने की थकान का अंत। जिसे वह प्रेम समझती रही, वह पत्थर निकला, और जिसे वह बचाती रही, वही उसे तोड़ता रहा।

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सन्नाटे में चीख 

इमारत के छोटे से फ़्लैट में रहने वाले सक्सेना दंपती की ज़िंदगी एक-दूसरे के इर्द-गिर्द सिमटी थी। लेकिन एक सुबह अचानक आई आंटी की मौत ने सब कुछ बदल दिया। लकवे से ग्रस्त अंकल अपनी आँखों के सामने सब कुछ होते हुए देख भी कुछ नहीं कर पाए। यह हृदयविदारक घटना अकेले रह रहे बुज़ुर्गों की असहायता और समाज की अनदेखी पर गहरे सवाल खड़े करती है।

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रेलवे पटरी के पास खड़ी एक महिला, जो दूर खेतों की ओर देख रही है अकेलेपन और आज़ादी की चाह का प्रतीक

उस दोपहर..

कभी-कभी जीवन में सबसे बड़ा संघर्ष बाहर की दुनिया से नहीं, बल्कि अपने भीतर के खालीपन से होता है। “पटरी के उस पार” एक ऐसी ही कहानी है, जो एक नवविवाहिता के मन के उस सूनेपन को उजागर करती है, जिसे शब्दों में बयां करना आसान नहीं होता।

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