सन्नाटे में चीख 

अकेले बुज़ुर्गों की बेबसी की दर्दनाक दास्तान

मधु चौधरी, लेखिका, बोरीवली, मुंबई

नज़दीक ही एक बहुमंज़िला इमारत के एक फ़्लैट में सक्सेना अंकल और उनकी पत्नी रहते थे।
उनकी बेटी विदेश में ही बस गई थी। आंटी स्वभाव से मिलनसार थीं, लेकिन सक्सेना अंकल लकवे के कारण पूरी तरह बिस्तर पर थे और कभी-कभी चिड़चिड़े हो जाते थे। आंटी की मदद के बिना वे कुछ भी कर पाने में असमर्थ थे।
आंटी घर और बाहर का सारा काम स्वयं ही करती थीं। बेटी के बार-बार कहने पर भी वे घर के कामों में मदद के लिए बाई रखने को तैयार नहीं होती थीं।
उनकी दिनचर्या पति की देखभाल, घर की सफ़ाई और पूजा-पाठ में ही बीत जाती थी। शाम को वे अक्सर नीचे बिल्डिंग में अपनी हमउम्र औरतों के साथ बैठने के लिए ज़रूर जाती थीं।
सक्सेना अंकल रुपयों-पैसों का हिसाब-किताब और फ़ोन पर ऑर्डर मंगाने जैसे कामों में आंटी की मदद किया करते थे। उनकी पूरी दुनिया आंटी के इर्द-गिर्द ही थी।
एक दिन सक्सेना आंटी सुबह का सारा काम निपटा कर बाज़ार जाने की तैयारी कर रही थीं।
अचानक उनके सीने में बहुत ज़ोर से दर्द उठा। सक्सेना अंकल यह देख रहे थे, और इससे पहले कि वे कुछ कह पाते, आंटी तेज़ दर्द से तड़पते हुए ज़मीन पर गिर पड़ीं और कुछ ही पलों में उनका शरीर शांत हो गया।
सक्सेना अंकल सब कुछ देखकर भी कुछ नहीं कर पा रहे थे। रोते-रोते उनकी साँसें उखड़ने लगीं। कभी वे आंटी को आवाज़ देते, कभी मदद के लिए चिल्लाते, लेकिन उनकी आवाज़ कमरे से बाहर नहीं जा पाई।दुर्भाग्य से उस दिन अंकल के पास मोबाइल भी नहीं था, इसी लाचारी में दो दिन बीत गए. अपनी गंदगी में उसी हालत में अपनी मृत पत्नी के साथ पड़े रहे.धीरेे-धीरे गंध भी असहनीय होती जा रही थी. इस लाचारी और बेबसी में भी उनकी सांसे रुकी क्यों नहीं यह सोचकर वे सिसकते रहे.
उनकी अर्धांगिनी यूँ साथ छोड़कर चली जाएगी, वे यक़ीन नहीं कर पा रहे थे। उन्हें लग रहा था कि आंटी बेहोश हो गई हैं और समय पर मदद मिले तो वे ठीक हो जाएँगी।
कभी वे रोते, कभी मदद के लिए पुकारते, फिर थककर निढाल होकर यूँ ही पड़े रहे।
वातावरण में गंध फैलने लगी। उनकी आस अब टूट चुकी थी। इस लाचारी और बेबसी में भी उनकी साँसें रुक क्यों नहीं जातीं — यह सोचकर वे सिसकते रहे।
जब दुर्गंध घर की दीवारों से बाहर निकली तो पड़ोसियों को शक हुआ। उन्होंने सक्सेना अंकल की बेटी को फ़ोन किया। उसने घबराकर पड़ोसियों से पुलिस को सूचना देने को कहा।
दरवाज़ा तोड़कर जब पुलिस अंदर गई तो ज़मीन पर सक्सेना आंटी का निष्प्राण शरीर पड़ा था और बिस्तर पर लगभग बेहोशी की हालत में सक्सेना अंकल। उस दृश्य को देखकर सभी के दिल दहल गए।
इस तरह की घटना अकेले रह रहे बुज़ुर्गों की समस्याओं और इस दिशा में कुछ आवश्यक कदम उठाने की ज़रूरत की ओर संकेत करती है।
इस वाकये से कुछ प्रश्न उभर कर सामने आते हैं —
और हमें उनके जवाब ढूँढ़ने ही होंगे।

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