हम कोख़जाये नहीं… मनजाये हैं…
लोकल ट्रेन की भीड़ में बने एक ऐसे भाई-बहन के रिश्ते की कहानी, जिसका कोई खून का रिश्ता नहीं, फिर भी उसमें अपनापन, सम्मान और भावनाओं की गहराई है.

लोकल ट्रेन की भीड़ में बने एक ऐसे भाई-बहन के रिश्ते की कहानी, जिसका कोई खून का रिश्ता नहीं, फिर भी उसमें अपनापन, सम्मान और भावनाओं की गहराई है.
कुछ स्पर्श शरीर को नहीं, मन को छूते हैं। वे न वासना जगाते हैं, न भय बस भीतर कहीं भरोसे की लौ जला देते हैं। मर्यादा में बंधे ऐसे स्पर्श रिश्तों को शब्दों से पहले समझा देते हैं और इंसान को इंसान होने का एहसास कराते हैं।
इमारत के छोटे से फ़्लैट में रहने वाले सक्सेना दंपती की ज़िंदगी एक-दूसरे के इर्द-गिर्द सिमटी थी। लेकिन एक सुबह अचानक आई आंटी की मौत ने सब कुछ बदल दिया। लकवे से ग्रस्त अंकल अपनी आँखों के सामने सब कुछ होते हुए देख भी कुछ नहीं कर पाए। यह हृदयविदारक घटना अकेले रह रहे बुज़ुर्गों की असहायता और समाज की अनदेखी पर गहरे सवाल खड़े करती है।
मुन्नी शायद पाँच साल की थी जब पहली बार उसे मामा के घर भेजा गया। बचपन से ही माता-पिता से दूर रहकर उसने बड़े लोगों के साए में अपना जीवन काटा — कभी बड़ी अम्मा के यहाँ, तो कभी बुआ के पास। पर मुन्नी के जीवन में सबसे कोमल, सबसे निर्मल प्रेम अगर किसी ने उसे दिया तो वो थे बेचन मामा। बेचन मामा के घर में मुन्नी ने पहली बार वो स्नेह पाया जो शायद एक बच्चा माँ-बाप से चाहता है। उनके साथ वह खेलती, रूठती, मनाती और उनके साये में हर डर भूल जाती।
बेचन मामा के बनाए कंडों की कलमों से लिखते हुए उसकी पटरी सबसे चमकती थी, और मामा की सिखाई हुई सुंदर लिखावट में उसका नाम लिखा जाता था। समय के साथ मुन्नी ने जाना कि बचपन में जो छाया उसे मिली, वह सामान्य नहीं थी — वह तो प्रेम की पराकाष्ठा थी, जो हर किसी के हिस्से में कहाँ आती है।
पन्द्रह साल बाद जब वह फिर मामा के घर लौटी, तो उसकी आँखें नम थीं, लेकिन दिल भरा हुआ — मामा की वही मुस्कान, वही स्नेह और वही अपनापन देखकर। उसने मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना की — “हे ईश्वर, हर बच्ची को एक बेचन मामा जरूर मिले