लोकल ट्रेन में बने एक अनोखे भाई-बहन के रिश्ते की भावुक कहानी

संध्या यादव, मुंबई
राखी के बाद वाला दिन, यानी शनिवार था।
हमेशा की तरह प्लेटफॉर्म के दोनों तरफ से ट्रेन गुजरी थी और ब्रिज ठसाठस भरा था। नीचे उतरना था—धक्का खाते, धक्का देते हुए। सीढ़ियों के ठीक नीचे रेलवे स्टॉल है। वहीं खड़ा था वो।
मेरी नजरें नीचे की तरफ, भीड़ से बचते हुए रास्ता तलाश रही थीं और उसकी नजरें ऊपर उठकर मेरा इंतजार करती हुई मिल ही गईं। इंतजार आंखों से छलक रहा था, शायद अब बेसबरा भी हो गया था।
“दीदी, तेरे कू मालूम कब से खड़ा मैं इधर?”
मेरी नजरें इंडिकेटर पर अपनी रोज की ट्रेन का समय देखने में व्यस्त थीं।
“क्या हुआ?”
“मेरे कू लगा तू चली गई, या आज नहीं आएगी।”
“क्या बात है! आज मेरा इंतजार… आज आपके साथी नहीं हैं क्या?” मैंने भी मुस्कुराते हुए कहा।
पिछले कई दिनों से वो चार लोगों के साथ होता है और ऐसी अवस्था में हम बस एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा देते हैं।
“दीदी, सुन ना… एक काम होता। तू करेगी क्या?”
“पहले आप बताओ, मैं सुनकर फिर बताऊंगी।”
सीढ़ियों के पास, जहाँ शायद एक-दो लोग ही खड़े थे, उसने मुझे बुलाया और अपनी हथेलियाँ आगे कर दीं। उसकी हथेली पर एक राखी जगमगा रही थी।
“तू मेरे कू बांधेगी क्या?”
मुझे नहीं पता ऐसा क्यों हुआ, पर बिना समय गंवाए मैंने वो राखी उसकी कलाई पर बाँध दी।
मुझे नहीं पता कितने लोगों ने मुझे ऐसा करते देखा। मुझे नहीं पता उन्होंने मेरे बारे में क्या सोचा।
मुझे सिर्फ इतना पता है—ये वो क्षण था, जो मेरी जिंदगी की किताब में हमेशा संभालकर रखा जाएगा।
उसने तुरंत दूसरी हथेली आगे कर दी। उसमें दो “हॉल्स” की गोलियाँ थीं।
“राखी बाँधने के बाद मिठाई भी खिलाते हैं न।”
“पर आपने तो मुँह मीठा ही नहीं, ठंडा भी कर दिया!”
हम दोनों ने जोर का ठहाका लगाया था।
उसने एक कागज में लिपटे दो “चाफा” के फूल मुझे दिए।
मैंने वो फूल तुरंत अपने बालों में खोंस लिए।
चेहरे को हथेलियों में दबाए, वो आश्चर्य से आँखों में आँसू लिए मुझे देख रहा था।
मैं बालों में फूल नहीं लगाती, पर उस दिन मैंने लगाए थे। ये सोचकर कि ये ईश्वर का प्रसाद है और उसे अस्वीकार कर मैं पाप और गुस्से का भागीदार बनने की हिम्मत नहीं रखती।
अपने बाएँ पैर में लगी चोट की वजह से अब अक्सर मैं चलती ट्रेन में कूदकर नहीं चढ़ पाती। पर मेरा ये भाई जब भी प्लेटफॉर्म पर उपस्थित हो, मुझे देखते ही ट्रेन के आते ही कूदकर चढ़ जाता है और अक्सर मेरे लिए सीट भी पकड़ने में कामयाब हो जाता है। लोगों की चौड़ी आँखें और ओठों की मुस्कान मुझ पर कोई असर नहीं करती।
रिश्ते खून, नाम, नस्ल, जाति, धर्म, भाषा या लिंग के मोहताज नहीं होते—किताबों में पढ़ी थी, पर जिंदगी में देख भी ली।
“अब मैं तेरा भाई… जब भी गरज पड़े, बोलने का।”
“रुको, जब सबके साथ रहोगे तब बोलूँगी।”
“ए दीदी, तू मेरी बहन ना! ऐसा नहीं करने का।”
वो हाथ जोड़ता है।
तब मन चीत्कार उठता है—
ईश्वर, अगले जनम इसे इस नरकीय कष्ट से मुक्त कर देना।
