
संध्या यादव, मुंबई
प्रेम में राधा मत बनना
प्रेम में मीरा भी मत बनना
प्रेम में रुक्मिणी बनने की
तो सोचना भी मत…
प्रेम में वैसी ही रहना
जैसी हो, जो हो।
हर युग में कृष्ण
छलिया ही रहा है…
कभी किसी को पूरा नहीं मिला।
उसे पूरी तरह से पाने की चाह में
खुद को घटाना
कृष्ण को पसंद नहीं…
कृष्ण प्रेम में
उसे ही मिले,
जिसने खुद को सौंप दिया उन्हें,
जो जिस रूप में, जैसा था…
कृष्ण का
जिस रूप में, जैसा था, जो
स्वीकार किया जाना नहीं मानते,
वो कृष्ण को नहीं जानते…
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