
रुपाली तोमर
आँसुओं की नदी हुई ज़िंदगी,
मन ऐसी तुमसे क्या भूल हुई।
स्वप्निल मकरंद के लिए
होठों ने पाँखुरी गुलाब की छुई।
थर्राया प्यास का चष्क,
चाँदनी शराब सी हुई।
गंध हो गई टुकड़े-टुकड़े,
उपवन से ऐसी क्या भूल हुई।
आँसुओं की नदी हुई ज़िंदगी,
मन ऐसी तुमसे क्या भूल हुई।
रसमय क्षण के बंधन की सांकल,
पागलपन खोल ही गया।
उसे छवि के दर्शन में
अंगारे सा ढहता संयम डोल ही गया।
दीवारें ढहती हैं उम्र की,
यौवन से ऐसी क्या भूल हुई।
आँसुओं की नदी हुई ज़िंदगी…..
मन ऐसी तुमसे क्या भूल हुई…..
मन ऐसी तुमसे क्या भूल हुई…….
