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खिड़की

पुरानी खिड़की के पास अधूरे प्रेम की स्मृतियों को दर्शाती हिंदी कविता एक पुरानी खिड़की, दो जोड़ी आँखें और अधूरे प्रेम की अनकही कहानी.
manjulata

मंजूलता, नोएडा

खिड़की वह
जो बहुत पुरानी हो
चुकी थी,

गवाह थी मेरे
प्यार की परवान चढ़ने की।

खोखली, कमजोर,
जैसे कोई बुजुर्ग की
बस साँसें चलती हों।

हर रोज़ मुझे वहीं
बैठे पाती और आँखें
सामने टिकाए हुए।

इधर से दो आँखें,
उधर से भी दो आँखें,
आँखों-आँखों में संवाद।

कोई कहाँ समझ पाया,
दो दिलों का
दीवानापन।

जब जर्जर हुए खिड़की के पल्ले
गिरे, प्रेम ने भी चोट खाया।

फिर कभी नहीं बैठी
उस खिड़की के पास,
जिसका खुद अस्तित्व नहीं था।

कायनात के कोने में
दुबका मेरा प्रेम
धराशायी हो गया।
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2 thoughts on “खिड़की

  1. खिड़की एक अंतरंग मित्र सी होती है । उसका सम्वाद सच्चाई से सही निर्णय लेने में सहायक होता है पर टूटी हुई खिड़की अपना अस्तित्व बिखरने के बाद अपनी सार्थकता खो देती है ।
    व्यक्ति को अपने निर्णय ख़ुद ही लेने पड़ते हैं ।
    खिड़की मरणोपरांत भी अपने मित्रों को अमूल्य सीख दे जाती है ।

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