
विजया डालमिया, हैदराबाद
सूख जाता है इंसान बादलों की बारिश में भीगने के बाद। जो हमेशा के लिए गीला कर दे, वह बारिश यादों की होती है।
बस स्टैंड पर खड़ा-खड़ा मैं अपनी बस की राह देख रहा था। गर्मी की चिलचिलाती धूप में बार-बार पसीना पोंछते हुए मेरी नज़र उस पर पड़ी। वह इस भयंकर गर्मी में भी शांतचित्त होकर खड़ी थी। भाव रहित चेहरा, मगर आँखें कुछ नीलापन लिए हुए बहुत कुछ बोलती-सी लगीं।
इतने में ही बस आई। मैं लपका, पर बस में जगह नहीं मिलने से फिर वहीं का वहीं। वह भी शायद इसी बस में जाने वाली थी। अब मैं और वह थोड़े ही फ़ासले के साथ… साथ-साथ खड़े थे।
मेरा गला सूख रहा था। मैंने पानी पिया और शिष्टाचारवश उसकी ओर बोतल बढ़ा दी। उसने ना कहकर धीरे से कहा… “धन्यवाद।”
बड़ी ही मीठी आवाज़।
मैंने कहा… “गर्मी बहुत है। पानी पी लो आप।”
उसने कुछ नहीं कहा। बस आने पर हम फिर साथ-साथ वाली सीट पर। अचानक सब कुछ उथल-पुथल। न जाने क्या हुआ और बस पलट गई।
होश आने पर मैंने अपने आप को हॉस्पिटल में पाया। मेरे सर पर पट्टी बँधी थी। मैंने इधर-उधर देखा और कुछ समझने की कोशिश की। इतने में ही वह आती दिखाई दी। मुझे सारा घटनाक्रम याद आ गया। मैंने देखा, वह मेरी तरफ़ ही आ रही थी। उसके नज़दीक आते ही एक भीनी-भीनी खुशबू मुझे सराबोर कर गई।
उसने मुस्कुराकर कहा… “कैसे हैं आप?”
“ठीक हूँ। और आप?”
“मैं भी एकदम ठीक। उस दिन आप बेहोश हो गए थे। और भी कई लोग घायल हो गए। मुझे भी हल्की-सी चोट लगी, पर अब सब ठीक है। आज आप पूरे 3 दिन के बाद होश में आए हैं।”
…”अच्छा।”
…..”लेकिन आप?”
…..”आपको देखने कोई नहीं आया था और डॉक्टर परेशान हो रहे थे। तो मैंने कह दिया कि… यह मेरे साथ हैं।”
कहकर उसने मुझे देखा। उस वक्त उसकी नीली आँखें मुझे बेहद खूबसूरत लगीं।
मैंने कहा… “अकेला हूँ ना। कौन आएगा?”
उसकी आँखों में हल्की-सी नमी आ गई। उसने कहा… “मैं समझ सकती हूँ, क्योंकि मैं भी अकेले ही…”
मैंने आश्चर्य से उसे देखा। आँखों ही आँखों में जैसे हम दोनों को जवाब मिल गया कि हम साथ-साथ क्यों हैं?
जब तक मैं हॉस्पिटल में था, वह डेली आती रही। उसकी मीठी बातें मुझे बहुत सुकून देती थीं। जी चाहता था, वह बोलती रहे और मैं यूँ ही सुनता रहूँ। उसके आने से लेकर उसके जाने के बाद भी काफ़ी देर तक वह भीनी-भीनी खुशबू मुझमें समाई रहती।
एक दिन जब वह आई, तो उसकी नीली आँखों में नमी-सी थी। मैंने मज़ाक-मज़ाक में कहा… “इस नीले समुंदर में आज ये मोती क्यों?”
उसने कुछ नहीं कहा। उस दिन हमने ज़्यादा बातें नहीं कीं।
जाते वक्त उसने कहा… “अब जाने का वक्त आ गया है।”
दूसरे दिन मुझे डिस्चार्ज मिलने वाला था। मैंने उसका बहुत इंतज़ार किया, पर वह नहीं आई। मैंने सोचा… हो सकता है कहीं बिज़ी हो और फिर रिश्ता ही क्या है मेरा और उसका? पता नहीं यह मेरे दुख की उपज थी या उसके प्रति प्यार? मैं समझ नहीं पाया।
घर आकर मुझे पहली बार बहुत अकेलापन महसूस हुआ। मैंने इधर-उधर पड़े अख़बारों को उठाया और बेमन से पढ़ने लगा। तभी एक खबर पर मेरी नज़रें ठहर गईं…
“बस एक्सीडेंट।”
मरने वालों की फोटो और नाम का विवरण देखते ही मेरे हाथों से पेपर छूट गया, क्योंकि उसमें उसकी भी फोटो थी।
थोड़ी देर के लिए मैं जैसे चेतनाशून्य हो गया। फिर मैंने थोड़ी देर बाद फिर से पेपर उठाया और उसके नाम को ध्यान से पढ़ा। वहाँ “नीला” लिखा था।
मैंने सोचा… “मैं भी कितना बड़ा पागल था, जो आज तक उससे उसका नाम भी नहीं पूछ पाया।”
पर फोटो…
मैंने सोचा, कहीं गलती से तो नहीं…? मैं रात भर उसके बारे में सोचता रहा।
दूसरे दिन सुबह-सुबह जब मैं हॉस्पिटल गया और उसके बारे में पता करने की कोशिश की… कि वह लड़की, जो मुझे देखने रोज़ आती थी, वह आज भी आई क्या?
तो सबने यही कहा… “पता नहीं।”
तभी मुझे वह नर्स दिखी, जो रोज़ मुझे दवा देने आती थी। मैंने सोचा, यह तो ज़रूर जानती होगी।
उससे पूछने पर उसने कहा…
“इतने दिनों में आपसे कोई भी मिलने नहीं आया। आप तो खुद ही खुद से बातें करते रहते थे। हमें तो यही लगता था कि आप थोड़े पागल-से हैं।”
सुनते ही मेरे बदन में एक ठंडी सिहरन-सी दौड़ गई। मैं धम से वहीं कुर्सी पर बैठ गया।
एक दिन पहले की बात याद आ गई, जब उसने कहा था…
“अब जाने का वक्त आ गया है।”
तभी मेरी आँखों में एक नमी महसूस की मैंने और वही जानी-पहचानी खुशबू मुझे सहला गई।
मानो वह कह रही हो…
पानी का एक कतरा आँख से गिरा अभी-अभी।
क्या तुमने मुझे याद किया अभी-अभी।
रोए बगैर ही छलक पड़े हैं आँसू।
लगता है कोई अपना करीब से गुज़रा, बिना बात किए अभी-अभी।
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