पुलिस की रेड पड़ी और इस बार वह पकड़ी गई। थाने में महिला पुलिस फटकार लगा रही थी—”शर्म नहीं आती तुम्हें शरीर बेचते हुए? तुम औरत के नाम पर कलंक हो!” वह सिर नीचा किए सुनती रही। सुन-सुनकर पत्थर हो गई। यह लताड़ पहली बार नहीं पड़ी थी, न जाने कितनी बार लोगों ने उसकी औक़ात उसे दिखाई है। वह यह भी जानती है कि दिन में औक़ात दिखाने वाले, रात में उसके दरवाज़े पर खड़े रहते हैं।
पुलिस की बातों का कोई जवाब उसने नहीं दिया। उसके पास जवाब था भी नहीं। अपने मन की बात कहने का, उसे हक़ भी कहाँ था। यह अधिकार तो तथाकथित सभ्य समाज को है। यही सब सोचते हुए, वह एक कोने में सिर नीचा किए चुपचाप बैठी रही। उसे याद आया—”माँ बचपन में ऋषि गौतम की पत्नी अहिल्या की कहानी सुनाया करती थी। देवों के देव इंद्र, गौतम ऋषि का रूप धारण कर अहिल्या की कुटिया में पहुँच गए। वह तो सच जान ही न सकी, पर दंड उसे ही मिला। दंड इंद्र को मिलना चाहिए था, अहिल्या का इसमें क्या दोष?”
“जिस पति के संग ब्याहकर आई, जिसे अपना जीवनसाथी माना, उसी ने इस दलदल में उसे धकेल दिया। अब चाहकर भी वह उस दलदल से बाहर नहीं आ सकती। जितनी बार उसने बाहर निकलने की कोशिश की, उतनी ही बार वह और गहरे धँसती जाती थी।”
सुना था, अहिल्या को श्रीराम के चरणों के स्पर्श से मुक्ति मिल गई थी। उसने सिर उठाकर चारों तरफ़ देखा। इंद्र तो बहुत मिल जाते हैं—जीती-जागती स्त्री को बुत बनाने को तैयार, पर कहीं कोई राम नहीं मिलता?

डॉ. ॠचा शर्मा, प्रोफेसर एवं अध्यक्ष हिंदी विभाग, अहिल्यानगर (अहमदनगर) महाराष्ट्र

बहुत सच्ची और अच्छी कहानी