परीक्षा केंद्र के बाहर प्रवेश पत्र और किताबें हाथ में लिए शांतिपूर्वक बैठे भारतीय विद्यार्थी, जिनके चेहरों पर टूटे सपनों, संघर्ष, निराशा और न्याय की उम्मीद साफ़ दिखाई दे रही है। यह दृश्य पेपर लीक से प्रभावित युवाओं की पीड़ा और बेहतर भविष्य की उनकी आशा का प्रतीक है।

सपनों का टूटना

‘सपनों का टूटना’ एक मार्मिक सामाजिक कविता है, जो पेपर लीक, युवाओं के संघर्ष, बेरोजगारी, अन्याय और टूटती उम्मीदों की दर्दनाक सच्चाई को उजागर करती है। कविता उन लाखों विद्यार्थियों की पीड़ा को स्वर देती है, जिनकी वर्षों की मेहनत भ्रष्ट व्यवस्था के कारण प्रभावित होती है। यह रचना केवल आक्रोश नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध एकजुट होकर आवाज़ उठाने और बदलाव की उम्मीद का भी संदेश देती है।

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बठिंडा की काली राख से ढकी बस्ती में रहने वाले एक गरीब परिवार

काली राख की बस्ती

यह मार्मिक कथा बठिंडा की काली राख से ढकी बस्ती में रहने वाले एक गरीब परिवार की है, जिसकी जिंदगी एक दर्दनाक घटना के बाद हमेशा के लिए बदल गई। गरीबी, मजबूरी और समाज की कठोर सच्चाइयों को उजागर करती यह कहानी दिल को झकझोर देती है।

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अमन की जोत फिर जलाना है

यह जीवन बस एक बहाना है — सांसों का आना-जाना, रिश्तों का मतलब और फर्ज़ निभाने की रस्में। अमीरों की थालियाँ भरी हैं, मगर गरीब का निवाला उनसे छिन गया है। मुफ़लिसी की बातें अब किससे कही जाएं, जब ज़माना इतना बेरहम हो गया है।

आईने अब चेहरों को नहीं, दिलों को पढ़ने लगे हैं — नया चेहरा, मगर दिल वही पुराना। विज्ञान के इस दौर में इंसान चाँद पर घर बसाने की सोच रहा है, जबकि ज़मीन पर जंगल सूने और परिंदे बेघर हो गए हैं।

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अब अहिल्या को राम नहीं मिलते…

पुलिस की रेड पड़ी और इस बार वह पकड़ी गई। थाने में महिला पुलिस फटकार लगा रही थी—”शर्म नहीं आती तुम्हें शरीर बेचते हुए? तुम औरत के नाम पर कलंक हो!” वह सिर नीचा किए सुनती रही। सुन-सुनकर पत्थर हो गई। यह लताड़ पहली बार नहीं पड़ी थी, न जाने कितनी बार लोगों ने उसकी औक़ात उसे दिखाई है। वह यह भी जानती है कि दिन में औक़ात दिखाने वाले, रात में उसके दरवाज़े पर खड़े रहते हैं।

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