सपनों का टूटना

परीक्षा केंद्र के बाहर प्रवेश पत्र और किताबें हाथ में लिए शांतिपूर्वक बैठे भारतीय विद्यार्थी, जिनके चेहरों पर टूटे सपनों, संघर्ष, निराशा और न्याय की उम्मीद साफ़ दिखाई दे रही है। यह दृश्य पेपर लीक से प्रभावित युवाओं की पीड़ा और बेहतर भविष्य की उनकी आशा का प्रतीक है।

डॉ. आशा सिंह सिकरवार

भूखे लोगों ने बताया ताकत के बारे में
बताया खाने को बहुत कुछ है
पर हम खाएंगे नहीं
हम भूखे रहेंगे
हमें भूख से ज्यादा दुख है
मारे गए बच्चों का
हमें फ्रिक है बच्चों के भविष्य की
करोड़ों करोड़ों बच्चे
जो पढ़कर कुछ बनना चाहते हैं
देश की व्यवस्था ने
जिन्हें कुचल दिया है
तुम नहीं समझोगे सपनों का टूटना क्या होता है
तुम नहीं समझोगे परीक्षा से पहले पेपर लीक हो जाना,
पेपर लीक हो जाना
मतलब,
हिम्मत तोड़ देना है ।

2. हमने उतार दी है कमीज़
हमारी नंगी पीठ पर
लाठियां बरसाओ
कर दो !
लहूलुहान ,

तुम बस लाठी चला सकते हो
तुम तोड़ सकते हो हाथ ,पांव,
फोड़ सकते हो हमारी आंख
जेल में बंद कर सकते हो
कर दो !
झूठा मुकदमा !

तुम नहीं तोड़ सकते हमारे संकल्पों को
तुम नहीं तोड़ सकते हो मुट्ठियों को
तुम नहीं दबा सकते हो हमारी ‘आवाज ‘
जो ‘अन्याय के खिलाफ ‘उठी है
नहीं है ये अकेली
ये बदल चुकी है ‘कोलाहल में ‘।

3. जीने से पहले
आत्म हत्या कर ली
आखिर क्यों ?
किसने हमें मौत तक पहुंचाया ?
सालों के परिश्रम पर
एक दिन में ही सबकुछ खत्म कर दिया
इतना सदमा सह नहीं पाए
जो सह गए
वे जगे,उठे ,ललकारें,
आवाज़ उठाई
पूरी ताकत से
पूरे देश को सुनाई दिया उनका दुःख
इकट्ठे बैठ गए
ताकि कोई आत्म हत्या न करें
इस व्यवस्था में ।

4 thoughts on “सपनों का टूटना

  1. मेरी कविता पर सार्थक टिप्पणी के लिए
    धन्यवाद ।

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