
नवनीत कमल, जगदलपुर (छत्तीसगढ़)
प्रीति -रथ पर गीत बैठे,किस दिशा में जा रहे हैं ।
सुर अभी भी काँपते हैं,भाव मन को भा रहे हैं।।
चाँदनी चुपके नयन में,स्वप्न मधुरिम बो रही है ।
भाव की सरिता मचल कर,शांति ओढ़े सो रही है।
रूप का उपमान कोई,आज फिर दोहरा रहा है-
उतरते जीवन पहर में,संतुलन भी खो रही है ।
रागिनी घुलने लगी जो,प्राण में रस घोलती है-
धड़कनों के तार कंपित,राग नव बरसा रहे हैं।
चाँद उतरा है गगन से,समय का अवशेष लेकर ।
रात महकी जा रही है,चांँदनी का वेष लेकर।
प्रेम के अनगिन पलो का,दे दिया उपहार मुझको-
स्वप्न फिर से आ रहे हैं,नित्य शुभ संदेश लेकर।
संग मेरे कंत बैठे,आज मन आराधना में –
नेह के कोमल तराने,प्राण में फिर छा रहे हैं।
दे रही मधुमय निमंत्रण,दूर से मृदु गान गाकर ।
नेह के अनुपम सलोने,रंग जीवन में सजाकर ।
अधर पर मुस्कान लेकर ,चाँद भी चुपचाप बैठा –
साथ सुरभित यामिनी में,सुमन सौरभ को बिछाकर ।
प्रीति के आलोक में फिर,कक्ष मन के जगमगाए-
दो हृदय मिलकर निरंतर,एक सुर में गा रहे हैं।

मेरी रचना को इस प्रतिष्ठित पटल पर प्रकाशित करने के लिए आपको हृदय तल से आभार व्यक्त करती है
बहुत सुन्दर और कोमल भाव ह्रदय की सहजता लिए हुए. 💓