कठपुतली

टूटी हुई कठपुतली की डोरियों के साथ आत्मविश्वास से खड़ी एक भारतीय महिला, जिसके चेहरे पर आत्मसम्मान, स्वतंत्रता और नई शुरुआत का भाव झलक रहा है। पृष्ठभूमि में अंधकार से उजाले की ओर जाता दृश्य नारी सशक्तिकरण और स्वतंत्र अस्तित्व का प्रतीक है।

रीता मिश्रा तिवारी

हे स्त्री..
मेरी कविता का विषय नहीं हो
जीवन की इक नई राह हो
पीछे छोड़ आई हो जो बंधनों को
बंदी गृह से भाग आई हो
यंत्रणा की पीड़ा से अब मुक्त हो
मेरी कविता का पात्र नहीं
संसार का सृजन हो तुम..!

हे स्त्री..
तुम्हारे समर्पण में प्रेम को देखा नहीं
तुम्हारी संवेदना को पुरुष
अपने सोच के मापदंड पर कमतर आंका
कसौटी पर थिरकती कठपुतली नहीं हो
अज्ञानता के अंधकार में
दिव्य प्रकाश हो तुम..!

हे स्त्री..
जिसे तुम प्रेम कहती थी
वो पुरुष के रिक्त हृदय की
पूर्ति हो तुम
तुम्हारे चोटिल पीठ पर उभरे शब्द
प्रेम कविता की कोई पंक्तियां नहीं
ईश्वर की अप्रतिम कृति हो तुम..!

3 thoughts on “कठपुतली

  1. मेरी कविता को मंच प्रदान करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद आपको सुरेश जी 🙏💐

  2. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति रीता जी 👌💐🙂💝

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *