
डॉ. कंचन जैन
हिला धरा का वक्ष, गगन में भीषण गर्जन छाएगा,
रुधिर शिराओं का उबलकर, नव इतिहास बनाएगा।
सोए हुए सिंह जब जागे, कौन उन्हें रोक पाएगा,
जब-जब युवा लड़ा है, उसने इतिहास रचा है।
दिशा-दिशा से हुंकार उठी है, समर-भूमि मुस्काती है,
युवा चरण की चाप सुनकर, कायरता थर्राती है।
शीश काटकर हथेली पर रख, जो रण में बढ़ जाता है,
जब-जब युवा लड़ा है, उसने इतिहास रचा है।
बाधाओं के पर्वत तोड़े, तूफानों की मोड़ दी धार,
कदम-कदम पर लिखे महाकाव्य, करके अरियों पर प्रहार।
जिस माटी में जन्म लिया, उसका गौरव दोहराएगा,
जब-जब युवा लड़ा है, उसने इतिहास रचा है।
हाथों में मशाल क्रांति की, आँखों में जलते अंगारे,
कुचल दिया हर एक ज़ुल्म को, बनकर माँ के राजदुलारे।
कांप उठी अन्याय की सत्ता, जब नवयुवक हुंकारा है,
जब-जब युवा लड़ा है, उसने इतिहास रचा है।
बहा पसीना और लहू, नवयुग का सूर्य उगाएगा,
युवा रक्त के इस सैलाब से, हर दुश्मन बह जाएगा।
आने वाली हर पीढ़ी को, यह हुंकार सुनाएगा,
जब-जब युवा लड़ा है, उसने इतिहास रचा है।
