परीक्षा केंद्र के बाहर सुरक्षा जांच से गुजरते भारतीय विद्यार्थी, जिनके चेहरों पर चिंता, उम्मीद और आत्मसम्मान के भाव दिखाई दे रहे हैं।

सपनों पर चलती लाठियाँ

यह कविता उन विद्यार्थियों की पीड़ा और संघर्ष को स्वर देती है, जो सपनों और उम्मीदों का बोझ लेकर शिक्षा के मंदिरों तक पहुँचते हैं, लेकिन कई बार सम्मान के बजाय संदेह और कठोरता का सामना करते हैं। कविता शिक्षा व्यवस्था, अनुशासन और संवेदनशील संवाद के बीच संतुलन की आवश्यकता पर गहरा प्रश्न उठाती है।

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परीक्षा हॉल में चिंतित छात्र, NEET पेपर लीक विवाद और शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाता दृश्य।

नीट पेपर लीक : जिम्मेदार कौन?

NEET पेपर लीक केवल एक परीक्षा की विफलता नहीं, बल्कि लाखों विद्यार्थियों के सपनों और विश्वास पर गहरा आघात है। वर्षों की मेहनत, परिवारों के त्याग और युवाओं के संघर्ष के बाद जब प्रश्नपत्र लीक होते हैं, तो केवल परीक्षा नहीं टूटती, बल्कि पूरा भरोसा बिखर जाता है। अब समय आ गया है कि शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही तय हो, दोषियों को कठोर सजा मिले और ऐसी पारदर्शी प्रणाली बनाई जाए जहाँ मेहनत का मूल्य पैसों और पहुंच से अधिक हो।

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समाज की संवेदनहीनता पर आधारित हिंदी कविता, जिसमें गंदगी, सफाई कर्मी की पीड़ा, पुल हादसा, अस्पताल लापरवाही और शिक्षा के व्यवसायीकरण को दर्शाया गया है

छोड़ो ना अपना क्या जाता है… 

हर बार जब समाज की किसी समस्या पर हम चुप रह जाते हैं और सोचते हैं“अपना क्या जाता है”, तब इंसानियत थोड़ा और मर जाती है। यह कविता उसी संवेदनहीन सोच पर तीखा प्रहार करती है।

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बच्चों को खुद चुनने दीजिए उनका सुर

एक पिता ने अपने बेटे को ज़बरदस्ती शास्त्रीय संगीत की कक्षा में भेज दिया, जबकि बच्चे को संगीत में कोई दिलचस्पी नहीं थी। यह लेख बताता है कि कैसे माता-पिता अपने अधूरे सपनों को बच्चों पर थोपते हैं और क्यों यह ज़रूरी है कि हर व्यक्ति—चाहे किसी भी उम्र का हो—अपने ही सपनों को पूरा करने का प्रयास करे। बच्चों को उनकी पसंद का रास्ता चुनने देना ही सच्ची परवरिश है।

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