सपनों पर चलती लाठियाँ

परीक्षा केंद्र के बाहर सुरक्षा जांच से गुजरते भारतीय विद्यार्थी, जिनके चेहरों पर चिंता, उम्मीद और आत्मसम्मान के भाव दिखाई दे रहे हैं।

मौसमी चंद्रा, पटना

कल तक जो बच्चे
तड़के सुबह घर से
माँ की हथेलियों की
छोटी-सी दुआ रखकर निकलते थे,
अब कंधों पर
माँ-बाप की उम्मीदें बाँधकर चलते हैं।

लेकिन ये क्या हो रहा है आजकल!

हर गली-चौराहे पर,
शिक्षालयों के आलीशान दरवाज़ों पर,
सबसे ज़्यादा अपमानित
वही बच्चे हो रहे हैं।

परीक्षा-कक्षों में जाने से पहले
टटोली जाती हैं उनकी जेबें,
खंगाली जाती है
पानी की बोतल,
रूमाल,
जूते-जुराबें।

चलो, सही है यहाँ तक भी!

फिर तोड़ दी जाती है
बेरहमी से
कलाई पर बँधी मौली,
बालों को
खींच-खींचकर बिखेरा जाता है,
मानो विद्यार्थी नहीं,
किसी अपराधी की
तलाशी ली जा रही हो।

वे बच्चे,
जो रात-रात भर
नींद गिरवी रखकर पढ़ते हैं,
जिनकी आँखों को
दिखाया जाता है
छोटी नौकरियों का
बड़ा-सा सपना

फिर उन्हीं सपनों पर
बीच सड़क
चलती हैं लाठियाँ,
पानी और गैस की बौछारें।

मारते क्यों हो, भाई?
उन्हें बता दो न
कि सपने देखना
इस देश में
सबसे जोखिम भरा काम है।

कितना विचित्र है!

चारदीवारी में
जिन्हें छींक आने पर भी
माएँ घबरा जाती हैं,
वे बच्चे
भीड़ और बूटों के बीच
अपना आत्मसम्मान
बचाते फिरते हैं।

यह सिर्फ बच्चों पर नहीं,
देश के भविष्य पर हमला है।
यह उन हाथों का अपमान है
जो कल
मशीनें चलाएँगे,
किताबें लिखेंगे,
देश बनाएँगे।

व्यवस्था!
यदि तुम्हें सचमुच
ऐसे आंदोलनों से डर लगता है,
तो पहले
अपने भीतर की क्रूरता पकड़ो।

यदि अनुशासन चाहिए,
तो डंडे नहीं,
सार्थक संवाद सीखो।

याद रखो—
जिस दिन विद्यार्थी
डरते-डरते पढ़ने लगेंगे,
उस दिन
हर विद्यालय जेल बन जाएगा,
और बूँद-बूँद रिस जाएगी
समूचे राष्ट्र की संवेदना।

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2 thoughts on “सपनों पर चलती लाठियाँ

  1. क्या बात है मौसमी थी, आज की शिक्षा व्यवस्था के सच को बयां करती आपकी लेखनी को सलाम

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