बच्चों को खुद चुनने दीजिए उनका सुर


एक पिता ने अपने बच्चे को जबरदस्ती शास्त्रीय संगीत की कक्षा में भर्ती करा दिया. बच्चे को सुगम संगीत में ही कोई दिलचस्पी न थी,शास्त्रीय संगीत तो उस पर बिजली सा टूटा. भारी भारी सरगम और आलाप उसके गले से फूटते ही न थे. अन्य बच्चों के साथ जैसे तैसे उन्हें सुरा बेसुरा गाकर पूरा करता और एक घंटा पूरा होते ही क्लास से सरपट दौड़ लगाता. उसे घर में खाली समय में भी कभी गुनगुनाते नहीं देखा गया.
थोड़ी बहुत रूचि नए गानों में थी मगर अब वह भी जाती रही. कभी माता पिता घर आये मेहमानों के सामने उसे राग यमन की बंदिश गाने को कहते तो वह गुस्से में भरकर मना कर देता. मगर माँ बाप की ज़िद के आगे एक न चलती तब वह आँखों में आंसू भरे नी ध प म प ग म प प म ग रे..गाना शुरू करता. प की जगह म और नी की जगह प को ठूंसकर जैसे तैसे सपाट भाव से गाता. पिता क्रोधित होते, मेहमान मजबूरी में इस प्रोग्राम को झेलते और बच्चा भयंकर झुंझलाता गाना खत्म होते ही कमरे से भाग जाता.
संगीत मास्टर के सामने सा रे ग धा पा नी पी गए गाकर उन्हें खिझा देता कि वही छोड़कर चले जाएं. वे बच्चे की संगीत में घोर अरुचि के बाद भी उसे पंडित भीमसेन बनाने पर तुले थे क्योंकि यह उनके बचपन का सपना था जो वे पूरा नहीं कर पाये थे.मैंने उनसे पूछा कि आपका सपना आप स्वयं पूरा क्यों नहीं करते? बालक के स्थान पर खुद क्यों नहीं भर्ती हो जाते उस संगीत क्लास में? वे बोले अरे अब थोड़े ही होता है.
अब तो बच्चे ही हमारे सपने पूरा करेंगे. कोई क्रिकेट की हसरत दिल में लिए जबरन पेंटिंग कर रहा है, कोई बॉटनी की किताब को ताकते हुए रो रोकर गणित पढ़ रहा है,कोई स्विमिंग की चाह मन में लिए तबला सीख रहा है.
40-50 की उम्र में सिर्फ अपने सपनों का करियर पाना छोड़ दें तो कोई सपना ऐसा नहीं जिसे अब खुद पूरा न किया जा सके . तबला,संगीत, पेंटिंग, अंग्रेजी बोलना, फ्रेंच सीखना, गिटार सीखना, स्विमिंग करना और तमाम ऐसे शौक जो बचपन में किन्ही भी कारणों से पूरे न हो सके, किसी भी उम्र में पूरे किए जा सकते हैं.बच्चों को उनके खुद के शौकों के साथ जीने दीजिये.
कहीं ऐसा न हो कि उन्हें अपने सपने पूरा करने के लिए अपने बच्चों के आने का इंतज़ार करना पड़े.तो आज ही अपने छूटे हुए सपने पूरा करने में लग जाइए और बच्चे से पूछिए उसे क्या पसंद है?

पल्लवी त्रिवेदी
-प्रसिद्ध साहित्यकार और मध्यप्रदेश राज्य पुलिस सेवा अधिकारी भोपाल (एआईजी)
(प्रकाशित पुस्तकें- अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा, तुम जहां भी हो, ख़ुशदेश का स़फर, ज़िक्रे यार चले- लवनोट्स, पत्तियों पर काँपता कोमल गांधार)

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