
शोभा सोनी, लेखिका, बड़वानी (मध्यप्रदेश)
जीवन है तो ये बहाना है,
सांस का आना-जाना है।
मतलब के हैं रिश्ते सभी,
हर इक फर्ज निभाना है।
अमीरों की भरी थाली ने,
छीना गरीब का निवाला है।
कहें किससे हाल-ए-मुफ़लिसी,
बड़ा ही बेरहम ये ज़माना है।
अब आईने भी समझ लेते हैं,
चेहरा नया है, दिल पुराना है।
दौर विज्ञान का ये कैसा आया,
आशियाँ चांद पे कहीं बनाना है।
हो गए वीरान कई जंगल हँसते,
उजड़े परिंदों को फिर बसाना है।
बैठ बारूद पे जो तमाशा देखे,
मौत उसकी भी ज़रूर आना है।
हदें भूल कुदरत सताने वालों,
कर्ज तुमको ही अब चुकाना है।
मिट रही हैं ज़िंदगियाँ धीरे-धीरे,
अमन की जोत फिर जलाना है।

वाह