देह पर ठहरा मौसम !!
“देह पर ठहरा मौसम!!” एक ऐसी संवेदनशील कविता है जिसमें प्रेम के प्रथम स्पर्श, स्मृतियों की गर्माहट और आत्मा तक उतरती अनुभूतियों को बेहद कलात्मक ढंग से व्यक्त किया गया है।

“देह पर ठहरा मौसम!!” एक ऐसी संवेदनशील कविता है जिसमें प्रेम के प्रथम स्पर्श, स्मृतियों की गर्माहट और आत्मा तक उतरती अनुभूतियों को बेहद कलात्मक ढंग से व्यक्त किया गया है।
श्मशान की राख से लौटकर जब ज़िंदगी की जिम्मेदारियाँ बाँहों में भर ली जाती हैं—तब यह कविता मृत्यु से आँख मिलाकर जीवन को चुनने का साहस बन जाती है।
यह कविता एक स्त्री के उस अनुभव को गद्यात्मक रूप में सामने रखती है, जहां शारीरिक छेड़छाड़ के बिना भी उसकी गरिमा पर हमला किया जाता है. यह रचना बताती है कि किसी की घूरती, गंदी नजरें भी हिंसा का ही रूप होती हैं, जो मन को भीतर तक घायल कर देती हैं. कविता समाज को यह सोचने पर मजबूर करती है कि अपराध केवल स्पर्श से नहीं, बल्कि दृष्टि और मानसिक उत्पीड़न से भी होता है, और ऐसी हर सोच व व्यवहार के खिलाफ आवाज उठाना जरूरी है.
पुलिस की रेड पड़ी और इस बार वह पकड़ी गई। थाने में महिला पुलिस फटकार लगा रही थी—”शर्म नहीं आती तुम्हें शरीर बेचते हुए? तुम औरत के नाम पर कलंक हो!” वह सिर नीचा किए सुनती रही। सुन-सुनकर पत्थर हो गई। यह लताड़ पहली बार नहीं पड़ी थी, न जाने कितनी बार लोगों ने उसकी औक़ात उसे दिखाई है। वह यह भी जानती है कि दिन में औक़ात दिखाने वाले, रात में उसके दरवाज़े पर खड़े रहते हैं।
यह कविता उन पुरानी प्रेमिकाओं और पत्नियों को समर्पित है जिन्हें पढ़ना-लिखना भले न आता हो, पर जिन्होंने प्रेम की सबसे सुंदर अभिव्यक्तियाँ रचीं — कभी गीली मिट्टी में पैर के अंगूठे से प्रेम-पत्र उकेरकर, तो कभी पलकों के इशारे से मन की बात कहकर। उनका प्रेम किताबों में नहीं, ज़मीन पर लिखा जाता था। आज की चिकनी टाइल्स और मार्बल की ज़मीन पर वो प्रेम-पत्र कहीं दबकर खो चुके हैं। इस निश्छल, मौन, पर गहरे प्रेम को समझने के लिए शायद हमें टाइम मशीन में लौटकर जाना होगा।
प्रेम की कथा इतनी सरल नहीं कि शब्दों में बाँधी जा सके। “धरती सब मसि कियो, लेखनी सब बनराई”—यह यूँ ही नहीं लिखा गया। जब प्रेम को लिखना चाहा, तो लेखनी ने हार मान ली। उसमें धूल, राख और व्यापार की कठोरता निकल पड़ी। क्योंकि प्रेम में कोई सौदा नहीं होता, कोई मोल नहीं होता।
कभी प्रेम में एक महामौन था, जिसमें न मिलने का डर था, न खोने का भय। स्त्री अपने घर की नींव संभालने आई, पुरुष घर को भरने कमाने निकला। पर प्रेम की अनुगूँज बहती रही—नदियों में, झरनों में, लहरों में, हवाओं में… बिना कहे, बिना सुने।
जो प्रेम को अभिशाप कहकर कोसता है, वह भी जानता है कि प्रेम होना ही सबसे बड़ा वरदान है। लेकिन प्रेम करने से पहले, उसे समझना, महसूस करना, जीना आना चाहिए।