यूँ ही लिखा नहीं
“धरती सब मसि कियो,
लेखनी सब बनराई “
प्रेम की अकथ कथा
बनराइयों में…
लेखन बैठी, जब हार के
धूल,राख औ’ गर्द निकला
या फिर था
बोलम बोल व्यापार का
ठिठक गए ये सुनकर
क्योंकि,
भय था आगे के संसार का।
कब था एक
महामौन प्रेम में
महामिलन का?
कब न था
पाने न खोने का भय?
स्त्री आई …
घर संभालने खातिर।
पुरुष आया…
कमाके घर भर देने वास्ते।
झरनों सा गिरने में …
समंदर की बेपरवाही सी
बिन पूछे,
बिन मोल भाव के,
नदियों से सब ले लेने में…
लहरों के रेतीले तटों पर,
सर पटकने में—
गूँजती रहती अनवरत
अनूगूँज प्रेम की
हर पल, हरदम…।
ध्यान से सुनो जरा,
इन बासंती बयारों में,
ज़र्रे-ज़र्रे में,
प्रेम की अकथ कथा —
गुन रही है, सुन रही है
और,
बही जा रही है
बिन कहे, बिन सुने…
तुमने, मुझमें, सब में!!
उसने भरसक अभिशाप दिया
“ज्जा, तुझे प्रेम हो जाए…।”
ठीक उससे पहले,
प्रेम करना तो सीख लो…!!

– रंजना शर्मा प्रसिद्ध साहित्यकार एवं हेड ऑफ डिपार्टमेंट बैथून कॉलेज कोलकाता

रंजना जी ,
बहुत सच्चाई से लिखी प्रेम की अकथ कथा ,
थरती सब कागद करौं फिर भी लिखी न जाए ।
लहरों को सर पटकने के बाद भी समुन्दर कहाँ मिलता है ? वे तो खुद समुन्दर बन जाती हैं ।
इस कहानी का कभी अन्त नहीं होता ।