जाने हमेशा ऐसा क्यों लगता है सारे असंभव काम आप ही कर सकती हो…
जादुई सी बेतरतीब से बंधे माँ के जूडे से हमेशा बाल की एक पतली सी लट छूट जाया करती थी, जो पसीने से गर्दन में चिपकी रहती। इतनी गर्मी में रोटियां बनाते हुए माँ पसीने से नहा उठती। सब काम निपटा कर जब सोने आती, उनके ठंडे थुलथुले और मुलायम पेट को छूना भी जादुई था।
पर कोई माँ से पूछता, तो उनके लिए इसमें कुछ भी जादुई नहीं था।
पेट के थुलथुला होने के पीछे की कहानी भी हमें पैदा करने वाला दर्द और फिर अपने प्रति वही लापरवाही… यह केवल मेरी माँ की कहानी नहीं, माँ हर घर में होती है — संस्कारी परिवारों के अंदर रोटियां बेलती, बच्चे पैदा करती, बहु बनती, पत्नी बनती और अपनी माँ की सिखाई हुई बातों से अपने पति के घर को जोड़ती।
जब हम छोटे होते हैं, तो उनकी कद्र नहीं कर पाते।
हम बड़े होते हैं, तो पाते हैं हम कितने गलत थे…
माँ ने कितने त्याग किए, फिर हम कृतज्ञ महसूस करते हैं।
माँ को गिफ्ट भेजते हैं, उनके साथ तस्वीरें खींचते हैं, मदर्स डे मनाते हैं।
तमाम बड़े-बड़े कवि माँ पर लिखी कविताएं अपनी माँ को भेजते हैं और उनके त्याग को सही सलाम करते हुए सही ठहरा देते हैं।
पर अभी भी कभी ये नहीं कह पाते —
“माँ, तू खुद के लिए जी…”
तुम्हारे लिए एक दिन मुक़र्रर करना हो ही नहीं सकता।
लेकिन आज के दिन, मेरी खुद के लिए ही ये विश करती हूं —
कि मैं भी आपके जैसी माँ बन पाऊं… जो उम्र के इस पड़ाव में भी माँ होने को निभा नहीं रही, जी रही है।
❤ बस प्यार… बेइंतहा सा… ❤❤

-संगीता जोशी
शिक्षिका एवं साहित्यकार, देहरादून

सुन्दर अभिव्यक्ति