
डॉ. रत्ना मानिक, प्रसिद्ध लेखिका, जमशेदपुर
यादों के बड़े से संदूक से
निकल आईं
कई रंग-बिरंगी कतरनें
बचपन की शोखियों की।
कुछ रेशमी ख़्वाब भी थे
यौवन के उन्माद के।
एक छोटे से संदूक में
बंद थी मेरी अल्हड़ता,
कुछ मोरपंखी सपने भी थे
वहीं कहीं दबे हुए।
कुछ खिलखिलाहटें
और दबी ज़ुबान से
सखियों वाली बातें,
कई कपड़ों के नीचे
सिकुड़ी, सिमटी, बेजान पड़ी थीं।
कुछ ठहाके भी रखे थे
संजोकर संदूक में,
पर गायब होती इंसानियत की तरह
वे भी नदारद थे संदूक से।
एक पोटली में
कुछ रूठे हुए जज़्बात थे,
संभाल रखे थे
करीने से मैंने,
याद दिलाते थे जो
यौवन की बेख़याली को।
वहीं एक तरफ पड़ी थीं
कुछ रेशमी साड़ियाँ
माँ की,
जिनमें रह गया था शेष
मातृत्व उनका।
होठों पर खिंच आई
स्मित की हल्की रेखा,
डबडबाई आँखों से
उन जीवंत लम्हों को
बंद कर दिया स्मृतियों के उस संदूक में
फिर से जतन से,
संजीदगी के चादर से ढँककर।
भविष्य में,
जब व्यावसायिकता के बाज़ार में
रिश्तों की बोली लग रही होगी,
छिन रहा होगा बचपन
मातृत्व से,
गुम हो रही होंगी अठखेलियाँ
बचपन की,
कहीं आहत हो रही होगी
मित्रता
अविश्वास के दीमक से—
तब मेरा यह संदूक
धरोहर होगा नई पौध के लिए,
नवीन दृष्टि देने के लिए जीवन को,
रिश्तों को परिभाषित करने के लिए
नए सिरे से……
ये रचनाएं भी पढ़ें-
शिव से हो जाओ तुम..
“कभी खुद के लिए भी जी ले माँ…”
प्रेम होने तो दो
सम्मान की सूखी रोटी

बहुत सुंदर कविता। उत्कृष्ट सृजन के लिए डॉक्टर रत्ना मानिक को बधाई।