कविता में एक स्त्री अपनी जीवन-यात्रा को स्मरण करती है। वह बताती है कि बचपन में वह माता-पिता की दुलारी थी—माँ की गुड़िया और पिता की आँखों की पुतली। आँगन और गलियों में सखियों संग खेलते-खेलते उसने प्रेम और रिश्तों को सँजोया।
फिर सपनों से भरे मन के साथ विवाह के बाद विदा हुई, नए रिश्तों की डोर बाँधी। परंतु आगे चलकर उसका जीवन वैसा सुखद नहीं रहा। पवित्र दांपत्य बंधन टूट गया, कई रातें अधूरी रह गईं। उसकी आँखें बरसती रहीं, पर मन का आँगन सूखा पड़ा रहा। इस कविता में बचपन की निश्छलता, विवाह का सपना और फिर विरह तथा विफलता की वेदना—तीनों भाव गहराई से व्यक्त हुए हैं।