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भारतीय युवा चर्चा करते हुए

क्या भारत का Gen Z गालीबाज है?

क्या कुछ लोगों के व्यवहार के आधार पर पूरी Gen Z पीढ़ी को कठघरे में खड़ा करना उचित है? यह विचार लेख शिक्षा, संस्कार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता पर चर्चा करता है। लेखक का मत है कि भारत के अधिकांश युवा मेहनती, जागरूक और संस्कारी हैं तथा कुछ घटनाओं के आधार पर पूरी पीढ़ी की छवि बनाना उचित नहीं है। यह लेख समसामयिक मुद्दे पर संवाद और आत्ममंथन का अवसर प्रदान करता है।

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प्रेम होने तो दो

प्रेम की कथा इतनी सरल नहीं कि शब्दों में बाँधी जा सके। “धरती सब मसि कियो, लेखनी सब बनराई”—यह यूँ ही नहीं लिखा गया। जब प्रेम को लिखना चाहा, तो लेखनी ने हार मान ली। उसमें धूल, राख और व्यापार की कठोरता निकल पड़ी। क्योंकि प्रेम में कोई सौदा नहीं होता, कोई मोल नहीं होता।

कभी प्रेम में एक महामौन था, जिसमें न मिलने का डर था, न खोने का भय। स्त्री अपने घर की नींव संभालने आई, पुरुष घर को भरने कमाने निकला। पर प्रेम की अनुगूँज बहती रही—नदियों में, झरनों में, लहरों में, हवाओं में… बिना कहे, बिना सुने।

जो प्रेम को अभिशाप कहकर कोसता है, वह भी जानता है कि प्रेम होना ही सबसे बड़ा वरदान है। लेकिन प्रेम करने से पहले, उसे समझना, महसूस करना, जीना आना चाहिए।

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